पुराने ज़माने के Star Actor Mahipal की रोचक कहानी पढ़िए | Mahipal
"बस सवा रुपए और एक नारियल दे दीजिए। मेरे करियर को सही दिशा आपने दी थी। मैं ऐसे कैसे आपसे कुछ मांग सकता हूं।" ये बात महिपाल जी ने वी.शांताराम जी से तब कही थी जब वी. शांताराम जी ने उनसे अपनी फिल्म नवरंग(बड़ी खूबसूरत फिल्म है।) में काम करने के बदले उनकी फीस जाननी चाही थी। इस कहानी के हीरो हैं महिपाल चंद्र भंडारी, जिन्हें सिनेमा की दुनिया में महिपाल नाम से जाना जाता था।

Biography of yesteryear star actor Mahipal - Photo: Social Media
आज मेरठ मंथन के माध्यम से जानिए पुराने ज़माने की धार्मिक और स्टंट-फैंटेसी फिल्मों के स्टार कलाकार महिपाल की कहानी। एक्टर महिपाल की ये कहानी आपको पसंद आएगी गारंटी है।
24 दिसंबर 1919 को जोधपुर में महिपाल जी का जन्म हुआ था। महिपाल जी जोधपुर के एक ओसवाल जैन परिवार में पैदा हुए थे। परिवार सभ्रांत था। इनके महादेव चंद पिता कोलकाता में बिजनेस करते थे।
महिपाल जी छह साल के ही थे जब इनकी मां का निधन हो गया था। ऐसे में महिपाल जी की परवरिश इनके दाद बजरंग चंद ने की। कला के प्रति महिपाल जी का झुकाव अपने दादा को देखकर हुआ।
इनके दादा बजरंग चंद चित्रकारी व कविताई में बहुत दिलचस्पी लेते थे। दाद जी के साथ ही महिपाल रामलीला भी देखने जाया करते थे। वहां से अभिनय के प्रति महिपाल जी के मन में रूचि पैदा हुई।
महिपाल चौथी कक्षा में थे जब पहली दफा उन्होंने स्टेज पर अभिनय किया। वो एक स्कूली नाटक था जिसका नाम था अभिमन्यू। महिपाल जी के अभिनय को खूब सराहा गया।
उन्हें बेस्ट एक्टर अवॉर्ड भी स्कूल वालों ने दिया। फिर तो महिपाल जी स्कूल में होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगातार हिस्सा लेते रहे। और कॉलेज में भी ये सिलसिला यूं ही चलता रहा।
भाषा पर महिपाल जी की अच्छी पकड़ थी। उनकी इस खूबी से कॉलेज के उनके गणित के एक प्रोफेसर बहुत प्रभावित थे। उनका नाम था हरनामदास सेठ। वो कवि भी थे। उन्होंने ही महिपाल जी को कविताएं लिखने के लिए प्रेरित किया।
साल 1937 में उदयपुर में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें महिपाल जी ने पहली दफा मंच पर अपनी एक कविता पढ़ी। वो कविता किसान की व्यथा पर थी। कविता का शीर्षक था "जो जग को अन्न प्रदान करे।"
उस कवि सम्मेलन में मशहूर कवि पंडित सोहनलाल द्विवेदी भी मौजूद थे। वो भी तब मंच पर ही थे। महिपाल जी ने जैसे ही अपनी कविता समाप्त की, पंडित सोहनलाल द्विवेदी ने उन्हें गले से लगा लिया।
उस कविता से जुड़ी एक रोचक बात ये है कि साल 1990 में पूर्व न्यायधीश व सांसद गुमनामल लोढ़ा ने वही कविता संसद में भी पढ़ी थी। और इस तरह महिपाल जी की वो कविता संसद के रिकॉर्ड में भी शामिल हो गई।
1940 का दशक की शुरुआत हुई। महिपाल जी ने जोधपुर के जसंवत कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। लखनऊ के एक सेठ और फिल्म निर्माता आनंदबिहारी लाल खंडेलवाल व पेसी बिल्लीमोरिया(जो सोहराब मोदी के सहायक थे।) व डायरेक्टर जी.पी. कपूर एक दिन नए कलाकारों की तलाश में जोधपुर आए।
वो एक नई फिल्म बनाने जा रहे थे जिसका निर्देशन पेसी बिल्लिमोरिया करने वाले थे। एक्टर्स की तलाश में कुछ लोग जोधपुर आए हैं, ये खबर जब शहर में फैली तो लोगों की भीड़ लग गई। जिस फिल्म के लिए एक्टर्स की तलाश की जा रही थी उसका नाम था नज़राना।
बंबई से आए इन लोगों ने कहा कि वो इस फिल्म को मारवाड़ी भाषा में भी बनाएंगे। और नाम होगा निजराणो। महिपाल जी ने एक दफा एक इंटरव्यू में बताया था कि वो फिल्म बनी थी। और वो मारवाड़ी भाषा की पहली फिल्म थी।
महिपाल जी के एक दोस्त हुआ करते थे जिनका नाम था कैलाश। उन्होंने महिपाल जी को अपने साथ लिया और जी.पी.कपूर से महिपाल जी का परिचय कराया। महिपाल जी के दोस्त कैलाश का पूरा नाम था कैलाश शिवपुरी। और वो अभिनेता ओम शिवपुरी जी के बड़े भाई थे।
कैलाश शिवपुरी व महिपाल जी का टेस्ट लिया गया। और दोनों को फिल्म में चुन लिया गया। महिपाल जी की तनख्वाह तय हुई 125 रुपए महीना। उस दौर में ये एक बड़ी रकम हुा करती थी।
महिपाल जी फिल्म के लिए चुन तो लिए गए। मगर उन्हें फिक्र थी कि वो ये बात अपने दादा को कैसे बताएं? उस ज़माने में फिल्मों में काम करने वाले लोगों को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता था। इसलिए महिपाल जी को डर था कि कहीं उनके दादा उन्हें मना ना कर दे।
डरते-डरते महिपाल जी ने अपने दादा को पूरी बात बताई। लेकिन दादा ने खुशी-खुशी महिपाल जी को फिल्म में काम करने की इजाज़त दे दी। हालांकि अन्य रिश्तेदारों ने ज़रूर विरोध किया।
उन्होंने कहा कि अब भंडारी खानदान का बेटा नाचने-गाने का काम करेगा। तवायफों के साथ रहेगा। लेकिन महिपाल जी के दादा ने किसी की नहीं सुनी। महिपाल ने वो फिल्म साइन कर ली और रिहर्सल करने के लिए अन्य लोगों संग लखनऊ आ गए।
एक महीने तक लखनऊ में रिहर्सल करने के बाद महिपाल व बाकि पूरी यूनिट शूटिंग के लिए पूना आ गई। मगर कुछ ही दिन बाद किसी बात को लेकर पेसी बिल्लीमोरिया व जी.पी.कपूर में मतभेद हो गया। बिल्लीमोरिया ने फिल्म छोड़ दी।
अब डायरेक्शन का ज़िम्मा जी.पी.कपूर ने संभाल लिया। पहले फिल्म की हीरोइन स्वर्णलता थी। मगर बाद में उन्हें हटाकर अनुराधा को हीरोइन ले लिया गया। महिपाल पहले किसी दूसरे किरदार में थे। बाद में उन्हें लीड रोल में ले लिया गया।
फिल्म के एक दृश्य को शूट करने के लिए हज़ारों दिए जलाए गए थे। उन दियों में बहुत सारा तेल खर्च हो गया। कुल 56 मन तेल लगा था वो दृश्य फिल्माने के लिए। इस खर्च से प्रोड्यूसर सेठ आनंदबिहारी लाल बहुत नाराज़ हो गए। उनके व डारेक्टर जी.पी.कपूर के बीच तनातनी हो गई।
किसी तरह फिल्म बनी और1942 में रिलीज़ भी हुई। लेकिन फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। महिपाल जी को नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हें लगा कि एक्टर बनने का उनका ख्वाब टूट गया। महिपाल जी ने सोचा कि अब उन्हें गीतकार बनने का प्रयास करना चाहिए। सो वो पूना से मुंबई चले आए।
मुंबई में महिपाल के शुरुआती कुछ महीने बहुत कठिनाईयों में बीते। इनके एक दोस्त हुआ करते थे जिनका नाम था पंडित इंद्र। वो लेखक थे। एक दिन उन्होंने महिपाल को डायरेक्टर चतुर्भुज दोषी से मिलाया। चतुर्भुज दोषी उन दिनों शंकर-पार्वती नाम की एक फिल्म बना रहे थे।
उन्होंने महिपाल को उस फिल्म में कामदेव के किरदार में साइन कर लिया। और पूरी फिल्म के लिए मेहनताना तय हुआ चार सौ रुपए। ये फिल्म रणजीत मूवीटोन के बैनर तले बनी थी और साल 1943 में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म सफल रही थी।
उन्हीं दिनों वी. शांताराम जी से महिपाल जी की मुलाकात हुई। वी. शांताराम ने महिपाल जी को सौ रुपए महीना की तनख्वाह पर अपनी फिल्म कंपनी राजकमल कला मंदिर में नौकरी पर रख लिया।
साल 1944 में आई राजकमल कला मंदिर की फिल्म विष्णू में महिपाल जी ने अभिनय किया। उन्होंने फिल्म में भगवान विष्णू का किरदार ही निभाया। साथ ही साथ फिल्म का टाइटल सॉन्ग हम तो भोले भाले माली भी लिखा। वो गाना मास्टर कृष्णराव ने संगीतबद्ध किया था।
अपनी इस नौकरी में महिपाल जी को एक ज़िम्मेदारी और निभानी पड़ी थी। उन्होंने मराठी इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकारों को हिंदी का सही उच्चारण सिखाया था।
इस नौकरी में महिपाल जी ने मास्टर विनायक(अभिनेत्री नंदा के पिता) के सहायक के तौर पर भी काम किया। इस दौरान अंधों की दुनिया(1947) व बनवासी(1948) में महिपाल ने हीरो के तौर पर काम भी किया।
चन्द्रमा पिक्चर्स के बैनर तले बनी आपकी सेवा में नामक फिल्म साल 1947 में रिलीज़ हुई थी। इस फिल्म के लिए महिपाल ने आठ गीत लिखे थे।
ये फिल्म इसलिए भी खास है क्योंकि इस फिल्म से ही पहली दफा लता मंगेशकर ने बतौर पार्श्वगायिका अपना करियर शुरू किया था।
लता जी ने महिपाल जी द्वारा लिखित एक ठुमरी ही गाई थी। वो ठुमरी अभिनेत्री रोहिणी भाटे पर फिल्माई गई थी। और उसे संगीतबद्ध किया था संगीतकार दत्ता डावजेकर ने।
वी. शांताराम की राजकमल कला मंदिर में महिपाल जी ने कोई साढ़े तीन सालों तक नौकरी की। मगर इस दौरान उनकी तनख्वाह नहीं बढ़ाई गई। इसलिए एक दिन चुपचाप उन्होंने राजकमल की नौकरी छोड़ी और सोहराब मोदी की मिनर्वा मूवीटोन जॉइन कर ली।
उन्होंने मिनर्वा मूवीटोन की दो फिल्में, नरसिंह अवतार व दौलत साइन की थी। ये दोनों ही फिल्में साल 1949 में रिलीज़ हुई थी। दौलत में महिपाल की हीरोइन थी मधुबाला। ये फिल्में चली तो ठीक-ठाक ही थी।
लेकिन इनके बाद मिनर्वा मूवीटोन में महिपाल जी की नौकरी खत्म हो गई। वो फिर से बेरोजगार हो गए। इसी बीच एक साल के भीतर ही उनके दादा व पिता का भी देहांत हो गया।
मुंबई आने से पहले ही महिपाल की शादी भी हो चुकी थी। और वो दो बेटियों, सुशीला व निर्मला के पिता भी बन चुके थे। इसलिए महिपाल जी को जोधपुर वापस आना पड़ गया। फिर पत्नी और बेटियों को अपने चाचा के पास छोड़कर महिपाल एक दफा फिर से मुंबई लौट आए।
एक दिन होमी वाडिया ने महिपाल को मिलने बुलाया। महिपाल उनसे मिले। और उन्होंने महिपाल जी को अपनी फिल्म गणेश महिमा में भगवान कृष्ण की भूमिका निभाने के लिए साइन कर लिया।
होमी वाडिया वो फिल्म अपने बैनर बसंत पिक्चर्स के अंडर में बना रहे थे। इस फिल्म में मीना कुमारी हीरोइन थी। ये फिल्म साल 1950 में रिलीज़ हुई थी। और ज़बरदस्त सफल रही।
इसी फिल्म ने महिपाल जी को धार्मिक फिल्मों का स्टार बनाया था। इसके बाद महिपाल जी ने मीना कुमारी के साथ होमी वाडिया की ही हनुमान पाताल विजय(1951), लक्ष्मीनारायण(1951) व अलाउद्दीन का जादुई चिराग़(1952)।
ये फिल्में भी बड़ी हिट साबित हुई। और इस तरह पौराणिक फिल्मों के साथ-साथ फैंटेसी फिल्मों का बड़ा नाम भी महिपाल जी बन गए।
ब्लॉग बीते हुए दिन के संचालक श्री शिशिर कृष्ण शर्मा जी को दिए एक इंटरव्यू में महिपाल जी ने बताया था कि कम्बोडिया, जावा-सुमात्रा तथा मध्य-पूर्व व खाड़ी देशों में भारत में बनी फैंटेसी फिल्में बहुत पसंद की जाती थी। इन इलाकों के लोग बड़े शौक से ये फैंटेसी फिल्में देखते थे।
एक दिन वी. शांताराम जी ने महिपाल जी को बुलाया और उन्हें एक कहानी सुनाई। कहानी सुनाने के बाद वी.शांताराम जी ने महिपाल जी से पूछा कि कितनी फीस लोगे?
महिपाल जी ने उन्हें जवाब दिया,"आपने ही मेरे करियर को सही दिशा दी थी। मैं ऐसे कैसे आपसे कुछ ले सकता हूं। बस एक नारियल और सवा रुपए दे दीजिएगा।" फिल्म थी नवरंग(1959) जिसे पूरा होने में एक साल लग गया था।
आज वी.शांताराम व महिपाल जी के करियर की टॉप फिल्मों में से एक है नवरंग। गायक महेंद्र कपूर की एज़ ए गायक डेब्यू फिल्म भी नवरंग ही थी। और महेंद्र कपूर को भी खूब प्रसिद्धी मिली थी नवरंग से।
नवरंग की सफलता ने महिपाल जी को स्टार बना दिया। इस कैटेगरी की फिल्मों के हाइएस्ट पेड एक्टर महिपाल जी हो गए। उन्होंने मुंबई मरीन लाइन्स इलाके में एक शानदार फ्लैट खरीदा। और अपने परिवार को भी जोधपुर से मुंबई बुला लिया।
करीब चालीस साल लंबे चले अपने करियर में महिपाल जी ने लगभग 130 फिल्मों में काम किया। इनमें से 108 के हीरो स्वंय महिपाल ही थे। और इनमें से अधिकतर में उनकी हीरोइनें रही निरूपा रॉय, अनिता गुहा व मीना कुमारी। ज
बकी शकीला, श्यामा व चित्रा संग भी महिपाल जी ने कुछ फिल्मों में काम किया। 1970 के दशक में भारत में पौराणिक व फैंटेसी फिल्मों का दौर खत्म होने लगा। दर्शकों को इस तरह की फिल्मों में अधिक दिलचस्पी नहीं रही।
नतीजा, ऐसी फिल्में बननी धीरे-धीरे बंद हो गई। महिपाल जी ने भी इसके बाद फिल्मों से रिटायर होना ही बेहतर समझा। वो चरित्र भूमिकाएं नहीं निभाना चाहते थे। 1978 की गंगासागर व 1980 की बद्रीनाथधाम महिपाल जी की आखिरी फिल्में थी।
फिल्मों से रिटायर होने के बाद महिपाल जी अपना अधिकतर समय लिखने-पढ़ने में व्यतीत करते थे। उनकी दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी। वो हर रोज़ आठ से दस किलोमीटर पैदल चला करते थे। इसिलिए जीवन के आखिरी वक्त तक वो शारीरिक व मानसिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ रहे।
15 मई 2005 के दिन महिपाल जी सुबह की सैर से घर लौटे ही थे कि अचानक उनका निधन हो गया। उस वक्त उनकी उम्र 85 साल हो चुकी थी। मेरठ मंथन भुलाए जा चुके इस शानदार कलाकार को नमन करता है। शत शत नमन।
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