Kamal Kapoor | कंजी आंखों वाला एक Bollywood Actor जिसकी कहानी जानने लायक है | Biography
मिड सिक्सीटज़ में बॉलीवुड फिल्मों के दर्शक एक ऐसे खलनायक से रूबरू हुए जिसकी कंजी आंखें उसे फिल्म इंडस्ट्री के दूसरे कलाकारों से भिन्न पहचान दे रही थी। नाम था इनका Kamal Kapoor, जो पहचाने तो गए विलेनियस भूमिकाएं निभाने के लिए। लेकिन एक वक्त वो भी था जब वो हीरो बनकर फिल्मों में आए थे।
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| Biography of Actor Kamal Kapoor - Photo: Social Media |
Kamal Kapoor का जन्म हुआ था 22 फरवरी 1920 को पेशावर में। जबकी उनका बचपन गुज़रा लाहौर में। लाहौर में ही उनकी पढा़ई-लिखाई भी हुई थी। Kamal Kapoor जी के बड़े भाई पुलिस अफसर थे। उस दौर के सेंट्रल प्रोविंस के जबलपुर, वर्धा और नागपुर जैसे शहरों में कमल जी के भाई की पोस्टिंग होती रहती थी।
पढ़ाई पूरी करने के बाद कमल कपूर जी अपने बड़े भाई के साथ रहने आना चाहते थे। लेकिन चूंकि इनके एक और भाई, जो कि इनकी मौसी के बेटे थे, वो मुंबई में रहा करते थे। तो कमल कपूर मुंबई आ गए।
इनके उस मौसेरे भाई का नाम था पृथ्वीराज कपूर। कमल कपूर उसी साल मुंबई आए थे जिस साल पृथ्वीराज कपूर जी ने पृथ्वी थिएटर की स्थापना की थी। यानि साल 1944 में।
कमल कपूर जी को भी अभिनय में दिलचस्पी थी। भाई पृथ्वीराज कपूर ने अपनी नाटक कंपनी पृथ्वी थिएटर के एक नाटक 'दीवार' में कमल कपूर जी को एक अंग्रेज अफसर का किरदार निभाने को दिया। और इस तरह थिएटर के रास्ते अभिनय की दुनिया में कमल कपूर जी का प्रवेश हो गया।
1946 में कमल कपूर की पहली फिल्म रिलीज़ हुई। फिल्म का नाम था 'दूर चलें।' ये फिल्म बनी थी दुर्गा पिक्चर्स के बैनर तले। डायरेक्टर थे फणि मजूमदार और संगीत दिया था के.सी.डे साहब ने।
कमल कपूर इस फिल्म के हीरो थे। उनकी हीरोइन थी सायरा बानो की मां, खूबसूरत नसीम बानो। फिल्म को सफलता तो नहीं मिली। लेकिन फिल्मी गलियारों में कमल कपूर जी को ज़रूर थोड़ी पहचान मिल गई।
कमल जी की दूसरी फिल्म थी 1947 में आई 'हातिमताई'। इसमें उनकी हीरोइन थी वनमाला। जबकी इसी साल वो सुरैया जी के साथ 'डाक बंगला' नाम की फिल्म में भी दिखे थे। 'डाक बंगला' तो उन्होंने सबसे पहले साइन की थी।
1952 में कमल कपूर दिखे थे फिल्म 'इंसान' में। और इसमें उनकी हीरोइन थी रागिनी, जो पाकिस्तान से आई थी। इसी साल अभिनेत्री श्यामा के अपोज़िट कमल कपूर जग्गू नाम की फिल्म में दिखे थे।
कुल मिलाकर कमल कपूर जी ने 21 फिल्मों में हीरो के किरदार जिए थे। लेकिन दुर्भाग्यवश, 'जग्गू' को छोड़कर कोई और फिल्म चल ना सकी।
1948 में आई राज कपूर की फिल्म 'आग' में Kamal Kapoor जी ने उनके पिता का किरदार भी निभाया था। बतौर डायरेक्टर-प्रोड्यूसर आग राज कपूर की डेब्यू फिल्म थी। राज कपूर उनके भतीजे लगते थे तो उनकी फिल्मों में तो Kamal Kapoor ने पिता का किरदार निभा दिया। लेकिन जब और लोगों ने कमल जी को वैसी ही भूमिकाएं ऑफर की तो उन्होंने उन सभी को मना कर दिया।
ब्लॉग बीते हुए दिन के शिशिर कृष्ण शर्मा जी को दिए एक इंटरव्यू में कमल कपूर जी ने बताया था कि उस ज़माने में उनका करियर एकदम दिशाहीन चल रहा था।
कैरेक्टर रोल्स वो निभाना नहीं चाहते थे। जबकी हीरो के तौर पर आई उनकी लगभग सभी फिल्में फ्लॉप हो चुकी थी। तब उन्होंने खुद एक फिल्म का निर्माण करने का फैसला किया।
1951 में निर्माता-निर्देशक राजिंदरनाथ जॉली के साथ मिलकर कमल कपूर जी ने 'कश्मीर' नामक फिल्म का निर्माण किया। उस फिल्म में मुख्य किरदार निभाए थे अरुण, वीना, निरूपा रॉय और अल नासिर ने।
कमल कपूर जी ने भी फिल्म में एक अहम किरदार जिया था। फिल्म में संगीत दिया था हंसराज बहल ने। मगर वो फिल्म भी फ्लॉप हो गई।
1954 में कमल कपूर जी ने अकेले ही 'खैबर' नामक एक फिल्म का निर्माण किया। ये फिल्म 'कपिल पिक्चर्स' के बैनर तले बनी थी। और इसका डायरेक्शन किया था केदार कपूर ने।
कमल कपूर इसके हीरो थे। हीरोइन थी निगार सुल्ताना। संगीत दिया था हंसराज बहल ने। लेकिन ये फिल्म बहुत पुरी तरह फ्लॉप हुई। कमल कपूर सड़क पर आ गए।
1946 में कमल जी ने बड़े मन से एक कार खरीदी थी। वो कार भी इस फिल्म के फ्लॉप होने की वजह से बिक गई। इसके बाद तो कमल जी को काम मिलना ही बंद हो गया।
हीरो का रोल तो छोड़िए, किसी ने उन्हें छोटे-मोटे रोल देना भी मुनासिब ना समझा। कमल कपूर जी के मुताबिक, वो उनके जीवन का सबसे खराब दौर था।
पूरे 9 सालों तक कमल कपूर बेरोजगार बैठे रहे। इस दौरान सिर्फ एक फिल्म, जिसका नाम 'आखिरी दांव'(1958) था, उसमें कमल जी ने काम किया था। और उसी में कमल कपूर पहली दफा खलनायक बने थे।
आखिरकार 1965 में आई फिल्म 'जौहर महमूद इन गोवा' से कमल कपूर जी की स्थिति सुधरी। इस फिल्म में कमल कपूर खलनायक ही बने थे। कमल कपूर इस फिल्म का श्रेय 'धर्मा प्रोडक्शन्स' के संस्थापक यश जौहर को देते हैं।
कमल जी ने बताया था कि यश जौहर ने उनका पहला नाटक 'दीवार' देखा था। उस नाटक के बाद से ही कमल कपूर का चेहरा यश जौहर जी के ज़ेहन में बस गया था। जब आई.एस.जौहर ने 'जौहर महमूद इन गोवा' फिल्म की कास्टिंग पर काम शुरू किया तो भाई यश जौहर की सलाह पर उन्होंने अंग्रेज खलनयाक के किरदार के लिए कमल कपूर जी को साइन कर लिया।
'जौहर महमूद इन गोवा' सुपरहिट रही। और उस फिल्म की कामयाबी के बाद कमल जी के अच्छे दिन शुरू हो गए। फिर तो उन्होंने जौहर इन बॉम्बे, जौहर महमूद इन हॉन्ग कॉन्ग, जब जब फूल खिले, राजा और रंक, दस्तक, पाकीज़ा, पापी, चोर मचाए शोर, फाइव राईफल्स, दो जासूस, दीवार, खेल खेल में, मर्द, तूफान व और भी कई फिल्मों में छोटे-बड़े किरदार निभाए। और अधिकतर में वो खलनायक ही थे। 1967 में आई 'दीवाना' नाम की फिल्म में कमल कपूर जी ने एक बार फिर से राज कपूर के पिता का किरदार निभाया था।
फिल्म 'जब जब फूल खिले' के जुबली फंक्शन में कमल कपूर जी को सम्मान स्वरूप एक ट्रॉफी दी गई थी। वो ट्रॉफी कुछ ज़्यादा ही भारी थी। तब पृथ्वीराज कपूर जी ने कमल कपूर जी को अपनी गाड़ी से उनके घर तक पहुंचाया था।
उस वक्त कमल जी को अपनी वो गाड़ी बहुत याद आई जो 1954 में उनकी बनाई फिल्म 'खैबर' के फ्लॉप होने के बाद बिक गई थी। साल 1966 में जब कमल कपूर जी ने फिर से एक कार खरीदी तो वो बहुत खुश हुए थे।
1975 में आई 'दीवार' में कमल कपूर जी ने एक सीन का एक किरदार निभाया था। और वो किरदार बहुत मशहूर हुआ था। दर्शकों को वो किरदार बहुत ज़्यादा पसंद आया था।
एक दफा तो बैंगलोर का एक ट्रैफिक हवलदार कमल जी से मिलने के लिए काफी दूर तक उनकी गाड़ी का पीछा करते हुए आया था। 1993 की फिल्म 'ज़ख्मी रूह' कमल कपूर की आखिरी फिल्म थी। इस फिल्म के बाद उन्होंने खुद को रिटायर कर लिया।
कमल कपूर जी के निजी जीवन की तरफ नज़र डालें तो पता चलता है कि उन्होंने सुमन देवी से शादी की थी। कमल जी के तीन बेटे और दो बेटियां हुई थी। उनके छोटे दामाद रमेश बहल भी एक वक्त पर फिल्म इंडस्ट्री के नामी प्रोड्यूसर-डायरेक्टर थे।
रमेश बहल ने द ट्रेन, जवानी दीवानी, कसमें वादे, पुकार व इन्द्रजीत जैसी फिल्मों का निर्माण किया था। 1990 में रमेश बहल की मृत्यु हो गई थी। एक्ट्रेस सोनाली बेंद्रे के पति गोल्डी बहल इन्हीं रमेश बहल के पुत्र हैं। यानि गोल्डी बहल कमल कपूर जी के नाति हैं।
कमल कपूर जी के छोटे भाई रविंदर कपूर भी एक्टर थे। 1950 के दशक की कुछ फिल्मों जैसे सुन तो ले हसीना, मैंने जीना सीख लिया व खूबसूरत धोखा में रविंदर कपूर हीरो थे। बाद में रविंदर कपूर चरित्र भूमिकाएं निभाने लगे थे। 02 अगस्त 2010 को 90 साल की उम्र में कमल कपूर जी ये दुनिया छोड़कर गए थे।
तो साथियों, ये थी गुज़रे ज़माने के बहुत डैशिंग दिखने वाले खलनायक कमल कपूर जी की कहानी। Meerut Manthan Kamal Kapoor जी को नमन करता है।
साथ ही साथ हम ये भी बताना चाहेंगे कि कमल कपूर जी के बारे में इतनी दुर्लभ जानकारियां हमें ब्लॉग बीते हुए दिन के एक लेख से मिली हैं। ये ब्लॉग शिशिर कृष्ण शर्मा जी चलाते हैं।
इनका एक यूट्यूब चैनल भी है। आपको इनका ब्लॉग व इनका यूट्यूब चैनल चैक करना चाहिए। बहुत अच्छी व दुर्लभ जानकारियां शिशिर कृष्ण शर्मा जी उपलब्ध कराते हैं। शिशिर जी का विशेष आभार।

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