Singer Dilraj Kaur | एक शानदार गायिका की जानने लायक कहानी | Biography

Dilraj Kaur जी के पिता एक सिविल इंजीनियर थे। उनका अधिकतर वक्त उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में गुज़रा था। दिलराज बहुत छोटी थी जब इनके पिता का ट्रांसफर चंदौसी में हुआ था। 


चंदौसी में ही दिलराज जी की मां ने इन्हें प्रयाग संगीत समिति नामक एक संस्था से नृत्य तबला वादन की शुरुआती शिक्षा दिलाई थी। इसी दौरान इनके पिता का ट्रांसफर किसी पहाड़ी इलाके में हो गया।


और चूंकि उन दिनों पहाड़ में ऐसे स्कूल नहीं थे जहां दिलराज जी के पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाते, इसलिए उन्होंने अपने परिवार को लखनऊ में छोड़ दिया।


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Singer Dilraj Kaur Biography - Photo: Social Media

एक दिन Dilraj Kaur जी कि मां इन्हें अपने साथ लखनऊ के भातखंडे संगीत महाविद्यालय ले गई। मां चाहती थी कि Dilraj Kaur को भातखंडे में दाखिला मिल जाए। उस ज़माने में श्री गोविंद नारायण नातू भातखंडे के प्रिसिंपल हुआ करते थे। गोविंद नारायण नातू जी खुद भी संगीत के बहुत बड़े विद्वान थे।


उस वक्त दिलराज कौर की उम्र मात्र 9 बरस ही थी। इतनी छोटी बच्ची को भातखंडे में दाखिला देने के लिए गोविंद नारायण जी तैयार नहीं थे। 


लेकिन दिलराज कौर जी की मां बार-बार उनसे कह रही थी कि आप एक दफा इन्हें सुन तो लीजिए। अगर तब आपको इसका गायन पसंद ना आए तो आप इसे रिजेक्ट कर दीजिएगा। लेकिन बिना सुने रिजेक्ट करना तो गलत बात है।


माता जी के इतना कहने पर गोविंद नारायण जी ने दिलराज कौर जी का एक टेस्ट लेने को कहा। और टेस्ट भातखंडे में ना होकर किसी दूसरी जगह लिया जाना था। 


दिलराज कौर जब टेस्ट देने उस जगह गई तो वहां टेस्ट लेने वाले गुरूजी इनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इनके फॉर्म पर लिख दिया कि इस बच्ची को सीधा थर्ड ईयर में दाखिला दिया जाए। 


ये देखकर दिलराज कौर जी की मां और परेशान हो गई। वो वापस भातखंडे आई और उन्होंने गोविंद नारायण जी से कहा कि ये इतनी बड़ी भी नहीं है कि इसे सीधे थर्ड ईयर में दाखिला मिले। कृप्या आप इसे फर्स्ट ईयर में ही दाखिला दीजिए। 


लेकिन गोविंद नारायण जी ने कहा कि अगर उन्होंने थर्ड ईयर में दाखिला देने की बात लिखी है तो फर्स्ट ईयर में हम दिलराज को दाखिला नहीं दे सकते। हां, हम इसे सेकेंड ईयर में हम ज़रूर दाखिला दे सकते हैं। और इस तरह लखनऊ के भातखंडे संगीत विद्यालय से दिलराज कौर जी की शास्त्रीय गायन शिक्षा शुरू हुई। 


21 मई 1960 को दिलराज कौर जी पैदा हुई थी। काफी पहले मैंने ग़ुलाम अली साहब की गाई एक गज़ल सुनी थी जिसे मोहसिन नक़वी जी ने लिखा था। उस गज़ल के बोल हैं 'इतनी मुद्दत बाद मिले हो। किन सोचों में गुम रहते हो।' मैं एक बार फिर से ग़ुलाम अली साहब का कायल हो गया था। 


आज दिलराज कौर जी के बारे में पढ़ते वक्त पता चला कि ये गज़ल दिलराज जी ने भी गाई है। मैं फौरन दिलराज जी की आवाज़ ये गज़ल यूट्यूब पर तलाशी। और आसानी से मिल भी गई। बस इतना ही कहूंगा। वाह वाह वाह। सुभान अल्लाह। माशा अल्लाह। क्या बात है दिलराज जी। क्या खूबसूरत गायकी है आपकी। कितनी प्यारी आवाज़ है आपकी।  


चलिए, दिलराज कौर जी के बारे में और भी कुछ रोचक बातें जानते हैं। जिस वक्त दिलराज कौर जी ने भातखंडे से संगीत की अपनी पढ़ाई पूरी की थी उस वक्त उनकी उम्र मात्र 13 बरस थी। भातखंडे के इतिहास में इतनी छोटी उम्र में संगीत की डिग्री लेने वाली दिलराज कौर शायद पहली होंगी। 


ये दिलराज कौर जी के हुनर का ही कमाल था कि भातखंडे से पास आऊट होने के बाद ऑल इंडिया रेडियो में भी इन्हें फौरन गाने का मौका मिल गया। वो भी बिना किसी ऑडिशन के। ऑल इंडिया रेडियो के ज़रिए दिलराज कौर जी को ख्याति मिलनी शुरू हो गई। 


एक दिन दिलराज जी को मुंबई से एक प्रोग्राम में गाने का न्यौता मिला। मुंबई साथ जाने के लिए इनके पिता छुट्टी लेकर लखनऊ गए थे। पिता के साथ दिलराज कौर तब पहली दफा मुंबई गई थी। मुंबई पहुंचकर जब ये उस प्रोग्राम के ऑर्गेनाइज़र ब्रिज नारायण जी से मिली तो वो भी इन्हें देखकर दंग रह गए। 


ब्रिज नारायण जी ने इनके पिता से कहा कि हम तो सोच रहे थे कि दिलराज कौर कोई वयस्क महिला होगी। ये तो कोई बच्ची है। इस प्रोग्राम में तो देश के बहुत बड़े-बड़े कलाकार हिस्सा लेने आते हैं। ये बच्ची स्टेज पर बैठी हुई ठीक से दिखाई भी नहीं देगी। हम इसको स्टेज पर गाने का मौका दे पाने में अमसर्थ हैं। 


ये सुनकर दिलराज जी के पिता काफी निराश हुए। लेकिन तभी दिलराज जी ने हिम्मत करके ब्रिज नारायण जी से बात की और कहा कि अंकल, अगर मैं आपके प्रोग्राम के स्तर का नहीं गाऊं तो आप मुझे फौरन रोक दीजिएगा। लेकिन प्लीज़, मुझे एक बार गाने का मौका ज़रूर दीजिए।

दिलराज कौर की ये बात सुनकर ब्रिज नारायण जी बोले कि ठीक है। हम तुम्हें स्टेज पर गाने का मौका देंगे। लेकिन अगर तुम्हारा गायन अच्छा ना हुआ तो हम बीच में ही पर्दा गिरा देंगे। 

दिलराज कौर मान गई। प्रोग्राम शुरू हुआ। और जब दिलराज कौर जी का नंबर आया तो इन्होंने कुछ ऐसी गायकी की कि वहां बैठा हर इंसान इनकी गायकी पर फिदा हो गया। सब वाह वाह कर उठे।

अगले दिन हर अखबार में दिलराज कौर जी की तस्वीर छपी। और इनके बारे में बड़े-बड़े लेख छापे गए। कई मैगज़ीन्स ने भी दिलराज कौर जी को कवर किया। संगीत कंपनी एचएमवी ने फौरन दिलराज कौर जी से संपर्क किया और इन्हें गाने के लिए साइन कर लिया। 

पहली फिल्म जिसमें दिलराज कौर जी को गाने का मौका मिला था वो थी साल 1977 में आई एक पंजाबी फिल्म गुरू मानियो ग्रंथ। और जानते हैं पहला गीत दिलराज कौर जी ने किसके साथ रिकॉर्ड किया था? महान मोहम्मद रफी साहब के साथ।  

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