Begum Para | गुज़रे ज़माने की एक Bold Actress जो भारत की पहली Pin-up Girl कहलाती है | Biography
ये हैं भारत की पहली पिनअप गर्ल बेगम पारा। लेकिन इन्हें पिनअप गर्ल कहा क्यों जाता था? इन्हें भारत की पहली पिनअप गर्ल इसलिए कहा जाता था क्योंकि साल 1951 में अमेरिका की मशहूर लाइफ मैगज़ीन में इनकी कुछ तस्वीरें छपी थी जो उस वक्त हमारे देश के हिसाब से बहुत बोल्ड थी।
बेगम पारा भारत में तो मशहूर थी ही। लेकिन लाइफ मैगज़ीन में इनकी तस्वीरें छपने के बाद इन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता मिल गई। ये वो वक्त था जब कोरिया युद्ध चल रहा था। और अमेरिकी सैनिक भी उस युद्ध में लड़ रहे थे।
तब अमेरिकी सैनिक बेगम पारा वो तस्वीरें बहुत पसंद करते थे जो लाइफ मैगज़ीन में छपी थी। कहा जाता है कि अमेरिकी सैनिक बेगम पारा के इतने दीवाने थे कि हर बैरक में बेगम पारा की तस्वीर टंगी मिलती थी। यहीं से बेगम पारा कहलाई भारत की पहली पिनअप गर्ल।
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| Biography of Actress Begum Para - Photo: Social Media |
25 दिसंबर 1926 को झेलम में बेगम पारा का जी का जन्म हुआ था। ब्लॉग बीते हुए दिन के संचालक व कर्ता-धर्ता श्री शिशिर कृष्ण शर्मा जी ने एक दफ़ा बेगम पारा का इंटरव्यू किया था।
उन्हीं के एक लेख से बेगम पारा जी के जीवन की कुछ कहानियां आज मेरठ मंथन के माध्यम से मैं आप पाठकों संग शेयर कर रहा हूं। मुझे पूरा यकीन है कि आपको बेगम पारा जी की ये कहानी पसंद आएगी। इसके लिए शिशिर कृष्ण जी का विशेष आभार।
आप सभी पाठकों से निवेदन है कि आप शिशिर जी का ब्लॉग बीते हुए दिन व इसी नाम से मौजूद उनका यूट्यूब चैनल अवश्य विज़िट करें। पुराने कलाकारों के बारे में शिशिर जी बहुत सटीक जानकारियां देते हैं। और इनकी जानकारियां बहुत रोचक भी होती हैं।
बेगम पारा के पिता जालंधर के रहने वाले थे। उनका नाम था मियां अहसान-उल-ह़क। वो न्यायधीश थे। और विभाजन से पहले भारत की तमाम रियासतों में उनकी नियुक्ति होती रहती थी। न्यायधीश की अपनी नौकरी के आखिरी दिनों में बेगम पारा के पिता राजस्थान में मुख्य न्यायधीश के पद पर कार्यरत थे।
चूंकि पिता का ट्रांसफर हर चार से पांच साल बाद होता रहता था तो बेटी बेगम पारा की पढ़ाई में रुकावट ना आए, इसके लिए बेगम पारा का दाखिला अलीगढ़ के एक हॉस्टल में करा दिया गया। अलीगढ़ में रहकर बेगम पारा ने बारहवीं तक पढ़ाई की थी।
बेगम पारा के एक भाई थे जो कोलकाता में बाटा कंपनी में नौकरी करते थे। उन्होंने बांग्ला फिल्मों की एक एक्ट्रेस प्रोतिमा दासगुप्ता से लव मैरिज की थी। चूंकि बेगम पारा के पिता आधुनिक विचारों को मानने वाले थे, इसलिए उस शादी से उनके घर में किसी ने आपत्ति नहीं जताई।
शादी के बाद बेगम पारा के भाई अपनी पत्नी प्रोतिमा दासगुप्ता को लेकर मुंबई आ गए। मुंबई में भी प्रोतिमा दासगुप्ता ने फिल्मों में काम करना जारी रखा। साल 1943 में रिलीज़ हुई ए.आर.कारदार की फिल्म नमस्ते में प्रोतिमा दासगुप्ता हीरोइन के रोल में दिखी।
इसी दौरान बेगम पारा भी अपने भाई व भाभी के पास छुट्टियां बिताने मुंबई आई। भाभी फिल्म इंडस्ट्री में थी तो बेगम पारा को भी फिल्म जगत की कुछ हस्तियों से मिलने का मौका मिला।
एक दिन प्रभात पिक्चर्स के बाबूराव पाई(पै) ने बेगम पारा को देखा। और उन्होंने बेगम पारा को अपनी अगली फिल्म चांद में हीरोइन के तौर पर साइन करने की पेशकश दी। जिसे बेगम पारा ने स्वीकार कर लिया। घर से भी किसी ने आपत्ति नहीं जताई। और इस तरह साल 1944 की चांद से बेगम पारा का डेब्यू हो गया। और फिर तो अगले 15 सालों तक वो फिल्मों में काम करती रही।
उन्होंने छमिया(1945), शालीमार(1946), सोहनी महिवाल(1946), ज़ंजीर, मेहंदी, नीलकमल, दुनिया एक सराय(सभी 1947), झरना, शहनाज़, सुहागरात, सुहागी(सभी 1948), दादा(1949), मेहरबानी, पगले(1950). उस्ताद पेड्रो(1951), जऩरिया(1952), दारा, लैला मजनूं, नया घर(1953), जलवा, लुटेरा, सौ का नोट, शहज़ादा, सितारा(सभी 1955), कर भला, किस्मत का खेल(1956) और आदमी(1957) सहित कुल 28 फिल्मों में बतौर हीरोइन काम किया।
इनमें फिल्म पगले, छमिया व झरना को बेगम पारा की भाभी प्रोतिमा दासगुप्ता ने डायरेक्ट व प्रोड्यूस किया था। बेगम पारा भी इन फिल्मों की को-प्रोड्यूसर थी। दलसुख पंचोली की फिल्मों लुटेरा में बेगम पारा के हीरो थे दिलीप कुमार के भाई नासिर खान।
नासिर खान व बेगम पारा ने दादा भगवान की कर भला व कुमार आनंद की आदमी में भी हीरो-हीरोइन के तौर पर काम किया था। साथ काम करने के दौरान दोनों एक-दूजे को पसंद करने लगे। और साल 1958 में बेगम पारा ने नासिर खान से शादी कर ली।
शिशिर कृष्ण जी को दिए इंटरव्यू में बेगम पारा ने बताया था कि शादी के बाद भी उन्हें फिल्मों में काम करने के कुछ ऑफर्स आए थे। लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया।
क्योंकि वो तब सिर्फ घर संभालना चाहती थी। 1957 की आदमी बेगम पारा की पहली पारी की आखिरी फिल्म साबित हुई। उसके बाद उन्होंने फिल्मों से खुद को पूरी तरह अलग कर दिया।
साल 1974 में बेगम पारा ने ज़िद नाम की एक फिल्म का निर्माण शुरू किया था जिसका निर्देशन उनके पति नासिर खान कर रहे थे। फिल्म में संजय खान, सायरा बानो व डैनी जैसे कलाकारों को लिया गया था। छह रील की शूटिंग पूरी भी कर ली गई थी।
अगले शेड्यूल की शूटिंग के लिए नासिर खान व बेगम पारा लोकेशन देखने के लिए डलहौजी गए थे। वहां से लौटते वक्त ये लोग अमृतसर में रुके थे। लेकिन अमृतसर में नासिर खान को दिल का दौरा आ गया। और उनका निधन हो गया।
उस वक्त नासिर खान और बेगम पारा के बच्चे काफी छोटे थे। जो पैसा बेगम पारा ने कमाया था वो सब उस फिल्म में लग चुका था। जबकी फिल्म पूरी भी नहीं बन सकी थी। वो बेगम पारा के जीवन का बहुत खराब दौर था।
बेगम पारा के कई नज़दीकी रिश्तेदार, जिनमें उनके कुछ भाई-बहन भी थे, वो पाकिस्तान जा चुके थे। जब बेगम पारा की मुसीबतों की खबर उन्हें मिली तो उन्होंने बेगम को पाकिस्तान आने का न्यौता दिया।
बेगम पारा अपने बच्चों सहित पाकिस्तान चली गई। मगर पाकिस्तान का रूढ़िवादी माहौल उन्हें रास नहीं आया। वो खुद को उस माहौल के हिसाब से नहीं ढाल सकी। और आखिरकार भारत वापस लौट आई। भारत में बेगम पारा की बड़ी बहन ज़रीना व और कुछ रिश्तेदार भी थे।
इनकी बहन ज़रीना की बेटी रुख़साना सुल्ताना ने मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के छोटे भाई शिवेंद्र सिंह से शादी की थी। रुख़साना सुल्ताना एक्ट्रेस अमृता सिंह की मां हैं। इंदिरा सरकार द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के साथ अपनी नज़दीकियों के चलते रुख़साना सुल्तान बहुत मशहूर हुई थी।
बेगम पारा के तीन बच्चे थे। एक बेटी व दो बेटे। उनके बड़े बेटे का नाम था नादिर खान। लेकिन बड़े बेटे की मौत काफी पहले ही हो गई थी। इनकी बेटी लुबना एक कामयाब कारोबारी हैं। और छोटा बेटा अय्यूब खान एक्टर है।
बेगम पारा ने कोई 50 सालों बाद साल 2007 में संजय लीला भंसाली की फिल्म सावंरिया से फिल्मों में वापसी की थी। मगर इसके एक साल बाद, साल 2008 की 10 दिसंबर को बेगम पारा का निधन हो गया। उस वक्त उनकी उम्र 82 साल थी। बेगम पारा को मेरठ मंथन का नमन।

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