कहानी Actor B.M. Vyas और उनके कुछ रोचक किरदारों की

"देखिए व्यास जी। अब तक जिन पांच कलाकारों को मैंने साइन किया वो सब कद में आपसे छोटे हैं। और मैं चाहता हूं कि स्क्रीन पर सारे कैदी एक जैसे दिखें। आप उन सबसे काफ़ी लंबे हैं। इसलिए वो रोल तो मैं आपको नहीं दे सकूंगा।" 

वी. शांताराम जी ने ये बात कही थी बी.एम.व्यास जी से। तब, जब व्यास जी उनके पास दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म में काम मांगने गए थे। 

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Interesting Facts About Late Actor Brij Mohan Vyas - Photo: Social Media

लेकिन फिर बी.एम. व्यास ने कुछ ऐसा किया कि वी. शांताराम जी को उन्हें ही वो किरदार देना पड़ा। क्या किया था बी.एम. व्यास ने? ये जानने के लिए हमें इस कहानी को शुरुआत से जानना होगा। पूरी कहानी पढ़िए। क्योंकि ये कहानी बहुत अच्छी है। पसंद आएगी आपको। 

अपनी फ़िल्म दो "आंखें बारह हाथ" के लिए वी. शांताराम जी को छह ऐसे कलाकारों की ज़रूरत थी जो छह उन कैदियों का किरदार निभा सकें जिन्हें सुधारने का ज़िम्मा जेल अफ़सर बने वी. शांताराम लेते हैं। उन छह कैदियों में से एक था जलिया नाई। 

वी. शांताराम जी को अन्य पांच कैदियों के किरदार निभाने के लिए तो कलाकार मिल गए थे। मगर उन्हें कोई ऐसा नहीं मिला था जो जलिया नाई का किरदार निभा सके। 

जब बी.एम.व्यास जी को पता चला कि वी. शांताराम जी को एक खास रोल निभाने के लिए एक्टर की तलाश है तो वो वी. शांताराम जी से मिलने पहुंच गए। 

वी. शांताराम जी ने बी.एम. व्यास जी को जलिया नाई का किरदार एक्सप्लेन तो कर दिया। मगर ये भी कहा कि आपको इस किरदार में नहीं लिया जा सकेगा। क्योंकि आप उन अन्य कलाकारों से कद में लंबे हैं जो अन्य कैदियों का रोल निभाने के लिए हमने चुने हैं।

व्यास जी उस दिन निराश होकर वी. शांताराम जी के ऑफ़िस से लौट तो आए। मगर उन्हें नींद नहीं आई उस रात। 

रात भर वो यही सोचते रहे कि कैसे वी. शांताराम जी को इस बात के लिए कन्विंस किया जाए कि मुझे जलिया नाई का रोल दिया जा सकता है। मैं वो किरदार निभा सकता हूं। और मेरे लंबे होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 

जैसे-तैसे वो रात कटी। अगले दिन सुबह सात बजे ही बी.एम.व्यास वी. शांताराम जी के दफ़्तर पहुंच गए। जबकी वो जानते थे कि वी. शांताराम आठ बजे तक आते हैं। जब शांताराम आए तो बी.एम.व्यास जी को देखकर उन्हें हैरत हुई। वो व्यास जी को अपने साथ भीतर ले गए और पूछा कि इतनी सुबह कैसे आना हुआ?

बी.एम. व्यास जी ने वी. शांताराम जी से कहा,"एक बात बताइए वी. शांताराम जी? क्या कोई लंबा आदमी किसी की हत्या नहीं कर सकता कभी?" 

वी. शांताराम समझ गए कि बी.एम. व्यास वाकई में उनकी फ़िल्म में काम करने को बेचैन हैं। वो "क्या लंबा आदमी किसी की हत्या नहीं कर सकता" वाली बात भी व्यास जी ने बड़ी शिद्दत से वी. शांताराम जी से कही थी। 

बस, वही बात वी. शांताराम को पसंद आई। उन्होंने फ़ौरन अपने स्कैच आर्टिस्ट को बुलाया और उससे कहा कि व्यास जी का एक ऐसा स्कैच बनाओ जिसमें वो जलिया नाई जैसे दिखें। स्कैच बना। और शायद स्कैच आर्टिस्ट भी कोई बहुत प्रतिभावान व्यक्ति रहा होगा। 

उसने जो बी.एम.व्यास जी का स्कैच उस दिन बनाया वो बहुत बढ़िया बन गया। वी. शांताराम जी को वो स्कैच पसंद आया। और आखिरकार उन्होंने बी.एम. व्यास जी को जलिया नाई का किरदार निभाने के लिए चुन लिया।

ये भी बड़ी अनोखी, और बहुत खूबसूरत बात है कि जब दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो बी.एम. व्यास जी द्वारा निभाया गया जलिया नाई का किरदार फ़िल्म के सभी छह क़ैदियों में सबसे अलग और प्रभावशाली दिख रहा था स्क्रीन पर। 

उस दौर के फ़िल्म क्रिटिक्स ने जलिया नाई के किरदार को इतनी अच्छी तरह से निभाने के लिए बी.एम. व्यास जी की भर-भरकर प्रशंसा की। 

यहां मैं कहना चाहूंगा कि जिन साथियों ने वी. शांताराम की दो आंखें बारह हाथ ना फ़िल्म देखी हो उन्हें वो ज़रूर देखनी चाहिए। वी. शांताराम जी की जो पहली फ़िल्म मैंने देखी थी वो वही थी। और मैं कायल हो गया था वी. शांताराम जी की फ़िल्म मेकिंग का। आप भी हो जाएंगे अगर आप सार्थक सिनेमा देखना पसंद करते हैं।

दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म के एक गाने की शूटिंग कोल्हापुर में चल रही थी। लंच हुआ और सभी कलाकारों के साथ ही वी. शांताराम जी भी लंच करने लगे। 

बीच लंच में बी.एम.व्यास जी ने वी. शांताराम जी से कहा,"शांताराम जी, कुछ दिन पहले ही मैंने एक अंग्रेजी फ़िल्म देखी है। 

उस फ़िल्म के एक सीन में मैंने देखा कि कुछ घोड़े सामने से दौड़ते हुए आते हैं और कैमरे के ऊपर से निकल जाते हैं। क्या हम ऐसा कुछ नहीं कर सकते? कि हम नाचते-नाचते चलते हुए आएं और कैमरे के ऊपर से निकल जाएं?" 

व्यास जी की ये बात वी. शांताराम जी को बड़ी नई और अनोखी लगी। और वी. शांताराम जी तो थे भी नए-नए प्रयोग करने के लिए मशहूर। तो वी. शांताराम जी बी.एम. व्यास जी की वो बात सुनकर अपना दिमाग दौड़ाने लगे। 

 यहां ये बात भी हमें जान लेनी चाहिए कि चूंकि ये पुराने ज़माने की बात है तो कैमरे भी उसी ज़माने के थे। मतलब बहुत बड़े और भारी कैमरे हुआ करते थे तब आज की तुलना में। 

वी. शांताराम जी ने तुरंत खाना छोड़ा और कुछ लोगों से लोकेशन के पास ही एक गड्ढा खुदवाया। जल्द से जल्द एक मजबूत शीशे का इंतज़ाम किया गया। 

एक असिस्टेंट को साथ लेकर वी. शांताराम जी खुद उस गड्ढे में कैमरा लेकर उतरे और ऊपर से शीशा रखवा लिया। फिर बी.एम.व्यास सहित अन्य पांच कलाकारों से कहा कि आप लोग नाचते हुए आईए और शीशे के ऊपर से निकल जाइए। शीशा मजबूत है। घबराइएगा मत।

शूटिंग शुरू हुई और वी. शांताराम जी ने एक्शन कहा। उनके एक्शन कहते ही सभी कलाकार नाचते-ठुमकते शीशे के ऊपर से निकल गए। 

और पहले ही टेक में शॉट ओके हो गया। जानते हैं ये शॉट आपको दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म के किस गीत में दिखेगा? उस गीत के बोल हैं "तक तक धूम धूम, तक तक धूम धूम।" 

क्या गाना क्रिएट किया था वी. शांताराम जी ने बॉस। वो भी उस ज़माने में जब तकनीक बहुत मैनुअल थी। आज जैसी तकनीक के ज़माने में उस वक्त के वी. शांताराम होते तो कहर ढा रहे होते अपने विज़ुअलाइज़ेशन से। 

बहुत भव्य गाना है ये। लता जी की मस्त गायकी, संध्या जी का बेबाक अभिनय व नृत्य। और अन्य कलाकारों की बेहतरीन अदायगी। जब पहली दफ़ा मैंने ये गाना सुना था तो पता नहीं कितनी बार रिपीट पर सुना था। प्योर गोल्ड हैं वी. शांताराम जी की फ़िल्में।

एक और कहानी याद आ गई है। तो उसे भी जान ही लीजिए। इस कहानी में दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म तो है ही। शम्मी कपूर की "तुमसा नहीं देखा" भी है, जिसे आमिर खान के ताऊ नासिर हुसैन डायरेक्ट किया था और काजोल के दादा शशधर मुखर्जी ने प्रोड्यूस किया था। 

तुमसा नहीं देखा फ़िल्म में भी बी.एम.व्यास जी ने एक अहम किरदार निभाया था। उन दिनों बी.एम.व्यास जी के पास खूब काम होता था। वो एक व्यस्त चरित्र कलाकार थे। उनके पास डेट्स की कमी रहती थी।

उस ज़माने में बी.एम.व्यास अपनी सबसे ज़्यादा डेट्स होमी वाडिया की फ़िल्मों के लिए रिज़र्व रखते थे। उसके बाद फ़िल्मिस्तान वालों की फ़िल्मों के लिए अपनी डेट्स रखते थे। और बची हुई डेट्स दूसरे बैनर्स को देते थे।

फ़िल्मिस्तान के अंडर में ही तुमसा नहीं देखा फ़िल्म बन रही थी। जिस वक्त नासिर हुसैन साहब ने तुमसा नहीं देखा फ़िल्म की शूटिंग शुरू की थी उस वक्त व्यास जी वी. शांताराम जी की दो आंखें बारह हाथ फ़िल्म की शूटिंग में बिज़ी थे। वो शूटिंग कोल्हापुर में चल रही थी।

जब व्यास जी तुमसा नहीं देखा फ़िल्म की शूटिंग पर नहीं पहुंचे तो फ़िल्मिस्तान के मालिक शशधर मुखर्जी बड़ा परेशान हुए। व्यास जी का किरदार अहम था। उनके कई दृश्य थे। मगर उनके ना आ पाने की वजह से वो सभी दृश्य रुके पड़े थे। 

ऐसे में फ़ैसला लिया गया कि बी.एम.व्यास को हटाकर उनकी जगह किसी दूसरे कलाकार को ले लिया जाए और उस पर वो दृश्य फ़िल्माएं जाएं। मगर ये बात डायरेक्टर नासिर हुसैन को पसंद नहीं आई। नासिर हुसैन का मानना था कि उस किरदार को बी.एम. व्यास ही अच्छी तरह से निभा सकते हैं।

नासिर हुसैन तो अड़े हुए थे। लेकिन शशधर मुखर्जी व्यास जी के उपलब्ध ना हो पाने से बड़ी टेंशन में थे। उन्होंने नासिर हुसैन साहब को समझाने का काफ़ी प्रयास किया। 

बी.एम. व्यास जी के पुत्र मनमोहन व्यास जी के मुताबिक, नासिर हुसैन जी ने शशधर मुखर्जी से ये तक कह दिया था कि वो इस फ़िल्म को छोड़ना पसंद करेंगे। लेकिन उस किरदार में व्यास जी के अलावा किसी और कलाकार को वो नहीं देखेंगे। 

साथियों ये बी.एम. व्यास जी की प्रतिभा पर नासिर हुसैन का भरोसा था। फाइनली वही हुआ। बी.एम.व्यास जी का इंतज़ार किया गया। और जब वो दो आंखे बारह हाथ फ़िल्म की शूटिंग कंप्लीट करके। कोल्हापुर से लौटे तो तुमसा नहीं देखा फ़िल्म के उनके दृश्य फ़िल्माए गए। 

साथियों बी.एम. व्यास जी का जन्म 22 अक्टूबर 1920 को राजस्थान के चुरू में हुआ था। जबकी 11 मार्च 2013 को बी.एम. व्यास ये दुनिया छोड़कर चले गए थे। इस लेख में हम बी.एम. व्यास जी की जीवनी नहीं, उनके फ़िल्म करियर ये जुड़ी रोचक बातें ही जानेंगे। और अगली कहानी ये है कि कैसे बी.एम. व्यास होमी वाडिया की सुपरहिट फ़िल्म सम्पूर्ण रामायण में रावण का किरदार निभाने के लिए चुने गए थे। ये कहानी भी आपको बहुत पसंद आने वाली है। चलिए, वो कहानी भी एकदम शुरूआत से जानते हैं।

"आपने मुझे ही रावण के रोल के लिए क्यों चुना? रावण तो बहुत बलशाली दिखता था। मैं तो पतला सा हूं। मैं कैसे कर पाउंगा रावण का रोल" बी.एम.व्यास ने होमी वाडिया से पूछा। वो दरअसल हैरान थे कि तमाम दूसरे कलाकारों के रहते हुए होमी वाडिया ने उन्हें कैसे रावण के रोल में चुन लिया। ये सम्पूर्ण रामायण फ़िल्म के दौरान का किस्सा है।

सम्पूर्ण रामायण फ़िल्म को बाबूभाई मिस्त्री ने डायरेक्ट किया था। और बसंत पिक्चर्स के बैनर तले इस फ़िल्म का निर्माण किया था होमी वाडिया ने। सीता जी बनी थी एक्ट्रेस अनिता गुहा और राम जी बने थे एक्टर महिपाल। राम और सीता के किरदारों के लिए तो कास्टिंग हो चुकी थी। 

सबकी नज़रें जमी थी इस बात पर कि रावण के किरदार के लिए किसे चुना जाएगा। फ़िल्म का अच्छा सा मुहुर्त रखा गया। अनिता गुहा और महिपाल पर मुहुर्त शॉट भी ले लिया गया। और होमी वाडिया ने सबको बताया कि लंच के बाद रावण का किरदार निभाने वाले एक्टर का नाम अनाउंस किया जाएगा।

जब लंच खत्म हो गया तो होमी वाडिया सबके सामने आए। वहां फ़िल्म इंडस्ट्री के तमाम लोग और मीडिया वाले भी थे। होमी वाडिया ने ऐलान किया कि बी.एम.व्यास जी रावण का किरदार निभाएंगे। सबने ज़ोर-ज़ोर तालियां बजाई। 

बी.एम.व्यास को बधाई दी। मगर बी.एम.व्यास खुश नहीं, हैरान थे। उन्हें नहीं समझ आ रहा था कि होमी वाडिया ने क्या सोचकर उन्हें रावण का रोल निभाने के लिए चुना है। शाम को जब सब लोग चले गए तो व्यास जी होमी वाडिया के ऑफ़िस पहुंच गए।

होमी वाडिया से मिलकर व्यास जी ने उनसे वो सब पूछा था जो आपने शुरुआत में पढ़ा, कि आपने मुझे ही क्यों चुना रावण के रोल के लिए। रावण तो बहुत बलशाली दिखता था। मगर मैं दुबला-पतला सा दिखने वाला आदमी हूं। 

व्यास जी की बात सुनकर होमी वाडिया ने उनसे कहा कि आप चिंता मत कीजिए व्यास जी। आपके लिए मैंने कुछ स्पेशल पैडिंग्स बनवाने का ऑर्डर दे दिया है। आप जब वो पैडिंग्स पहनेंगे तो रावण के रोल के लिए फिट दिखेंगे।

कोई चार दिन बाद वो पैडिंग्स आ गई और होमी वाडिया ने बी.एम.व्यास को ट्रायल के लिए बुलवा लिया। व्यास जी का मेकअप किया गया। उन्हें वो पैडिंग्स पहनाई गई जिनका ज़िक्र होमी वाडिया ने किया था। और व्यास जी को बिल्कुल रावण वाला लुक दिया गया। 

सारा काम होने के बाद जब बी.एम.व्यास जी ने खुद को आईने में देखा तो वो बड़े हैरान हुए। चौंक गए। वो वाकई में रावण जैसे दिख रहे थे। बी.एम.व्यास बहुत खुश हुए। 

और फिर तो रावण के रोल को सम्पूर्ण रामायण फ़िल्म में उन्होंने ऐसा जिया कि जब वो फ़िल्म रिलीज़ हुई उस वक्त रावण की छवि में लोगों ने बी.एम.व्यास को ही अपने मस्तिष्क में बसा लिया।

तो साथियों, है ना ये कहानी वाकई में ज़बरदस्त? आपको ऐसी ज़बरदस्त कहानियां मेरठ मंथन पर हमेशा पढ़ने को मिलती रहेंगी। अभी भी कई सारी कहानियां हैं इस ब्लॉग पर। वो भी पढ़िए अगर आज पहली बार यहां आए हैं तो। चलिए बी.एम. व्यास जी के शुरुआती फ़िल्म करियर के बारे में भी कुछ जान लेते हैं।

बी.एम.व्यास के बड़े भाई भरत व्यास भी एक वक्त पर हिंदी सिनेमा के बहुत नामी गीतकार हुआ करते थे। उन्हीं के बुलावे पर बी.एम. व्यास जी मुंबई गए थे। मुंबई में इन्हें पृथ्वी थिएटर से जुड़ने का मौका मिला और ये अभिनय करने लगे। साथ ही ये गायन भी किया करते थे। 

उस ज़माने में इनकी तनख्वाह थी 75 रुपए महीना जो कि डीसेंट अमाउंट समझी जाती थी। साल 1946 में पहली दफा बी.एम.व्यास जी ने चेतन आनंद की डेब्यू फिल्म नीचा नगर में अभिनय किया था।

बी.एम.व्यास जी की तीसरी फिल्म थी 1949 में आई राज कपूर की बरसात। जी हां, तीसरी। नीचा नगर के बाद इन्होंने एक और फिल्म में काम किया था। मगर मुझे उसका नाम पता नहीं चल सका। चलिए वापस इनकी तीसरी फिल्म बरसात पर आते हैं। 

इस फिल्म से बी.एम.व्यास कैसे जुड़े, इसके पीछे एक कहानी है जो दिलचस्प है। चलिए वो सुनाता हूं आपको। तो हुआ यूं कि बरसात की कास्टिंग के वक्त राज कपूर ने बी.एम.व्यास जी को नरगिस के पिता का रोल निभाने को कहा। 

व्यास जी ने उन्हें जवाब दिया,"मैं पहले इस बारे में पापाजी से बात करूंगा। अगर उन्होंने इजाज़त दे दी तो मैं आपकी फिल्म में ज़रूर काम करूंगा।" ये पापाजी थे पृथ्वीराज कपूर। जी हां, पृथ्वी थिएटर से जुड़े अधिकतर लोग उन्हें पापाजी कहकर ही संबोधित करते थे।

बी.एम.व्यास ने राज कपूर के ऑफर के बारे में पापाजी उर्फ पृथ्वीराज कपूर जी को बताया। पृथ्वीराज कपूर जी ने तभी एक कागज़ उठाया और उस पर लिखा,"मैं अपने कलाकारों को उड़ते हुए देखना चाहता हूं। मेरी तरफ से आपके फिल्मों में काम करने पर कोई भी बंदिश नहीं है। जब भी आप चाहें पृथ्वी थिएटर दोबारा जॉइन कर सकते हैं।"

ये खबर जब राज कपूर को मिली तो वो बहुत खुश हुए। राज कपूर ने पहले तो इनका नाम ब्रिज मोहन व्यास से बी.एम.व्यास किया। जी हां, ये राज कपूर थे जिनकी वजह से दुनिया ने इन्हें बी.एम.व्यास के नाम से जाना। वर्ना शुरुआती दोनों फिल्मों में इनका नाम सिर्फ व्यास लिखा गया था।

उस वक्त राज कपूर ने इनसे कहा था,"मेरी फिल्म ज़रूर होगी। और ये फिल्म हिट होने के बाद आपके पास भी बहुत सारी फिल्मों के ऑफर आएंगे। इसलिए आपका नाम यूनीक होना चाहिए। और आपको अब अंग्रेजी में दस्तख़त करना भी सीखना होगा।" 

बी.एम.व्यास जी को अंग्रेजी में दस्तख़त करना सिखाने के लिए राज कपूर ने एक ट्यूटर रखी थी। और उसने पूरे एक महीने तक इन्हें तरह-तरह से दस्तख़त करना सिखाया था। यहां ये भी आपको बता दूं कि बी.एम.व्यास जी ने कभी भी स्कूली पढ़ाई नहीं की थी। वो कभी स्कूल नहीं गए थे। 

जबकी इंटरनेट पर कहा जाता है कि उन्होंने संस्कृत में स्नातक किया था। ये गलत है। हालांकि ये सच है कि वो संस्कृत के महारथी थे। 

दरअसल, वो एक ऐसे ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे जहां बच्चों को शुरुआत से ही वेद-पुराणों की शिक्षा दी जाती थी। घर में मिले धार्मिक माहौल से ही वो संस्कृत के अभ्यस्त हो गए थे।

खैर, राज कपूर की बरसात वाली कहानी पर वापस आते हैं। वैसे उस कहानी में ज़्यादा कुछ बचा नहीं है। बरसात की कामयाबी ने वाकई में बी.एम.व्यास जी को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया था। राज कपूर की भविष्यवाणी सच साबित हुई। 

बी.एम.व्यास जी ने उसके बाद जाने कितनी ही फिल्मों में शानदार अभिनय किया। अपने करियर में इनके पास कभी भी काम की कमी नहीं रही। पूरे करियर में इन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया था। 

और 1992 में ये फिल्मों से रिटायर हो गए। इनकी आखिरी फिल्म थी दौलत की जंग। इस फिल्म में ये एक कबीले के गुरूजी के किरदार में दिखे थे।

ऊपर आपने पढ़ा होगा मैंने एक जगह लिखा है कि इनकी दूसरी फिल्म कौन सी थी ये मुझे पता नहीं चला। लेकिन इत्तेफाक देखिए, अभी एक आर्टिकल पढ़ रहा था गूगल पर तो वहां से पता चला कि इनकी दूसरी फिल्म भी राज कपूर की ही थी। 

आग, जो 1948 में आई थी। उसमें इनका नाम ब्रिजमोहन दिया गया था। जबकी नीचा नगर में इनका नाम क्या दिया गया था? व्यास। वैसे इंडस्ट्री में लोग इन्हें व्यास जी ही कहकर पुकारा करते थे।

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