10 Best Movies of Satyajit Ray | महान फ़िल्मकार सत्यजित रे साहब की दस शानदार फ़िल्में
भारत के महान फिल्मकार सत्यजित रे की 10 शानदार फ़िल्में जो हर सिनेप्रेमी को ज़रूर देखनी चाहिए। वैसे तो अगर आप अलग तरह का भारतीय सिनेमा देखने के शौकीन हैं तो आपको सत्यजित रे साहब की हर फ़िल्म देखनी चाहिए।
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| Best Movies of Satyajit Ray - Photo: Social Media |
मगर ये सत्यजित रे की 10 वो फ़िल्में हैं जो आपको पहली फ़ुरसत में देख लेनी चाहिए, अगर आपको मिल सकें तो। चलिए जानते हैं इन दस फ़िल्मों के बारे में।
अरान्येर दिन रात्री(1970)
अंग्रेजी में इस फिल्म को डेज़ एंड नाइट्स इन दि फोरेस्ट नाम दिया गया था। ये फिल्म साल 1970 में आई थी। और इसमें खूबसूरत एक्ट्रेस सिमी ग्रेवाल का एक अलग ही रूप आपको देखने को मिलेगा। आप दंग रह जाएंगे सिमी को इस फिल्म में देखकर।
ये फिल्म चार दोस्तों की कहानी है जो खूब पढ़े-लिखे हैं। एक दिन शहरी ज़िंदगी से तंग आकर वो बिहार के एक जंगली इलाके में घूमने चले जाते हैं। और फिर इन्हें एकदम अलग ही अनुभव होते हैं। इस फिल्म में शर्मिला टैगोर व अपर्णा सेन जैसे कलाकार भी हैं।
हीरक राजार देश(1980)
इस फिल्म का इंग्लिश नाम है द किंगडम ऑफ डायमंड्स। ये फिल्म डिस्टोपियन फैंटेसी म्यूज़िकल फिल्म की कैटेगरी में रखी जाती है। ये फिल्म साल 1969 में आई सत्यजित रे की ही एक और फिल्म गूपी गाइन बाघा बाइन का सीक्वल है।
साल 1992 में इस सीरीज़ का तीसरा भाग आया था जिसका नाम था गूपी बाघा फिरे इलो। ये फिल्म राजनीति पर कटाक्ष करती है। कहा जाता है कि सत्यजित रे ने इस फिल्म के ज़रिए उस वक्त की कांग्रेस सरकार पर तगड़ा प्रहार किया था।
नायक(1966)
सत्यजित रे की नायक रिलीज़ हुई थी साल 1966 में। इस फिल्म को अंग्रेजी में कहा गया था द हीरो। ये फिल्म एक एक्टर की कहानी है जिसे सुपरस्टार का दर्जा हासिल होता है।
उसे एक स्पेशल अवॉर्ड रिसीव करने के लिए दिल्ली बुलाया जाता है। वो ट्रेन से दिल्ली जाता है। ट्रेन में उस एक्टर की मुलाकात एक नौजवान जर्नलिस्ट लड़की से होती है। वो जर्नलिस्ट ट्रेन में ही उस एक्टर का इंटरव्यू करती है।
और उस इंटरव्यू के दौरान एक्टर उस जर्नलिस्ट लड़की को अपने बारे में बहुत शॉकिंग बातें भी बताता है। एक्टर का किरदार निभाया है बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार उत्तम कुमार ने। और जर्नलिस्ट बनी हैं शर्मिला टैगोर।
शतरंज के खिलाड़ी(1977)
अगर आपने शतरंज के खिलाड़ी फिल्म नहीं भी देखी होगी तो इसकी तस्वीरें इंटरनेट पर ज़रूर देखी होंगी। द चेस प्लेयर्स यानि शतरंज के खिलाड़ी नामक ये फिल्म 1977 में रिलीज़ हुई थी। ये फिल्म 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के आस-पास की कहानी है।
इस फिल्म में संजीव कुमार, सईद जाफरी, शबाना आज़मी, अमजद खान, फरीदा जलाल, डेविड अब्राहम, फारुक़ शेख़ और रिचर्ड एटनबरॉ जैसे कलाकारों ने काम किया था।
अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म में नैरेशन का काम किया था। ये फिल्म काफी चर्चाओं में रही थी। सत्यजित रे को इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर बेस्ट डायरेक्टर अवॉर्ड मिला था।
देवी(1960)
एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर के करियर की दूसरी फिल्म थी देवी। ये फिल्म एक ऐसे आदमी की कहानी है जिसे एक रात सपना आता है कि उसकी बहू देवी काली का अवतार है।
और उसे अपने ख्वाब पर इतना भरोसा होता है कि वो ये मानना शुरू कर देता है कि उसकी बहू तो वाकई में काली का अवतार है। आस-पास के लोगों को भी वो यही बताता है। और आखिरकार उसकी बहू भी कहीं ना कहीं ये मान लेती है कि वो देवी काली का ही एक अवतार है।
चारूलता(1964)
ये फिल्म सत्यजित रे द्वारा बनाई गई एक बहुत लोकप्रिय फिल्म है। एक ऐसी फिल्म जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया। चारूलता का अंग्रेजी नाम है दि लोनली वाइफ। ये गुरूदेव रबिंद्रनाथ टैगोर के एक नोवेल पर आधारित फिल्म है।
ये एक ऐसी महिला की कहानी है जिसे जीवन में अकेलेपन का सामना करना पड़ता है। जबकी वो शादीशुदा है और उसके पति उससे बेहद प्यार भी करते हैं। इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जिन्हें मास्टरपीस कहा जाता है।
प्रतिद्वंदी(1970)
प्रतिद्वंदी एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो अपने विचारों के साथ समझौता नहीं करता। अंग्रेजी में इस फिल्म को दि एडवर्सरी नाम दिया गया था। अपने विचारों के चलते इस नौजवान को कहीं नौकरी मिल पाती। लोग उसे कम्यूनिस्ट कहने लगते हैं।
हालांकि वो खुद को कम्यूनिस्ट नहीं मानता। कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़ने का ऑफर तक उसे दिया जाता है। लेकिन वो साफ इन्कार कर देता है। उसी नौजवान के जीवन की कशमकश की कहानी है प्रतिद्वंदी।
सोनार केल्ला(1974)
ये कहानी है एक ऐसे स्कूली बच्चे की जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे अपने पिछले जन्म की बातें अच्छी तरह से याद हैं। द फोर्ट्रेस यानि सोना केल्ला सत्यजित रे द्वारा क्रिएट किया गया अपना एक डिटेक्टिव वर्ल्ड है। ये फिल्म बहुत एंटरटेनिंग और एडवेंचरस है।
तीन कन्या(1961)
थ्री गर्ल्स यानि तीन कन्या आई थी साल 1961 में। ये वास्तव में तीन अलग-अलग कहानियों का एक मिश्रण है। ये तीनों किसी ज़माने में कहानियां गुरूदेव रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई थी। ये कहानियां हैं द पोस्टमास्टर, मोनीहारा, समाप्ति।
भारत में तो ये फिल्म तीनो कहानियों के साथ रिलीज़ की गई थी। लेकिन इंटरनेशनली इस फिल्म को दो कहानियों के साथ रिलीज़ किया गया था। दूसरी कहानी मोनीहारा इंटरनेशनल रिलीज़ में नहीं थी। इसलिए अंग्रेजी में इस फिल्म को टू गर्ल्स कहा जाता है।
जलसागर(1958)
जलसागर जिसे अंग्रेजी में कहा गया दि म्यूज़िक रूम। ये कहानी है एक ऐसे ज़मींदार की जो अपने खानदान के खोए हुए वैभव को फिर से प्राप्त करने का ख्वाब देखता है। भारत को आज़ादी मिलने के बाद जब ज़मींदारी प्रथा समाप्त की गई तो इस ज़मींदार को ये बहुत बुरा लगा।
हालांकि ये ज़मींदार अब भी अपने घर में संगीत की महफिलें सजाता है। मगर अब वो लोग भी उसे चुनौती देने लगे हैं जो कभी उसके सामने सर झुकाए खड़े रहते थे।

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