बरशैणी का वो 500 रुपए वाला गेस्ट हाउस और पिंक फ्लॉयड का जूलिया ड्रीम
"भाई कितना चार्ज होगा रूम का?" मैंने गेस्ट हाउस वाले लड़के से पूछा। मेरे और तोमर के लिए किसी भी गेस्ट हाउस में घुसने से पहले यही सबसे पहला और सबसे ज़रूरी सवाल होता है। शायद हमारे जैसे अधिकतर घुमक्कड़ भी सबसे पहले यही पूछते होंगे, जब वो किसी होटल या गेस्ट हाउस जाते होंगे।
"आप पहले रूम देख लीजिए। फिर आपको चार्ज भी बता दूंगा।" वो लड़का बोला। मुझे लगा कि अब ये हमें उल्लू बनाने की कोशिश करेगा। कुछ के कुछ दाम बताएगा। वैसे भी वीकेंड है। हिमाचल में टूरिस्टों की तगड़ी भीड़ होती है। और इस दफा तो लॉन्ग वीकेंड पड़ गया है।
मैंने तोमर की तरफ देखा। उसने अपनी आंखों से वही कहा जो इस तरह की स्थिति में वो ज़ुबान से भी कहता, "लैट्स सी।"

Guest House in Barshaini Himachal Pradesh and Julia Dream of Pink Flyod - Photo: Social Media
सेब के बागीचों से घिरे उस गेस्ट हाउस में वो हमें किसी मेज़ जैसे रास्ते से लेकर जाने लगा। और फिर एक बड़ी पतली सी बालकनी वाला लकड़ी से बनी एक दुमंज़िला इमारत की दूसरी मंज़िल पर ले गया। वहां जाते हुए हम लकड़ी के तख्तों से बने दो छोटे-छोटे जीनों से होकर गुज़रे। फीलिंग आई कि भई वाह, ये तो एकदम टिपिकल हिमाचली ट्रेडिशन का घर है। चलो आज ये भी देख लिया।
"आपको रूम बुरा नहीं लगेगा।" ताला खोलते हुए गेस्ट हाउस का वो लड़का बोला।
"किराया तो बुरा लग सकता है।" ये मैं बोला। लेकिन उससे नहीं। खुद से। अपने मन ही मन में।
रूम खुलने के बाद जब हम उसमें भीतर दाखिल हुए तो इट वॉज़ ए प्लैज़ेंट सरप्राइज़। रूम वाकई में बुरा नहीं था। अच्छा-खासा डबल बैड और बड़ी-बड़ी खिड़कियां जिनसे सेब के पेड़ों की टहनियां टच हो रही थी। एकदम हिमाचली स्टाइल का रूम।
रूम के भीतर दो कुर्सियां और टेबल पड़े थे। चूंकि हम दोनों सीधी खड़ी चढ़ाई करके यहां तक पहुंचे थे तो हम दोनों की बॉडी का बैंड बज चुका था। सो कोई भी डील फाइनल होने से पहले ही हमने अपने-अपने बैग एक-एक कुर्सियों पर पटक दिए।
सच कहूं तो हम मन ही मन ये तय कर चुके थे कि अगर से लड़का 1500 रुपए तक भी मांगेगा तो इस रूम को बुक कर लेंगे। थकान इतनी ज़्यादा हो चुकी थी कि और किसी गेस्ट हाउस के धक्के खाने की हिम्मत नहीं थी।
और वैसे भी ज़्यादा ऑप्शन्स बचे नहीं थे हमारे पास। पीछे से जितनों से भी पूछते आ रहे थे उन सभी ने मना कर दिया था। सब फुल हो चुके थे। और अब इसके बाद दो-तीन गेस्ट हाउस ही रह गए थे।
"पसंद आया?" गेस्ट हाउस वाले उस लड़के ने पूरे कॉन्फिडेंस में पूछा। लेकिन हम ऐसे बनने की कोशिश कर रहे थे कि कुछ खास पसंद नहीं आया। किराया पसंद का होगा तो शायद ज़रूर पसंद आएगा।
"अब तो बताओ कितना चार्ज है इसका।" इस दफा तोमर बोला।
"पांच सौ रुपए।" उस लड़के ने कहा। मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। लगा जैसे थकान का असर आज पहली दफा शरीर से अधिक कानों पर, या दिमाग पर हो गया है। इस बार मैंने पूछा,"कितना बताया?"
"पांच सौ भईया।" वो ऐसे बोला जैसे उसे लोगों के ऐसे सरप्राइज़्ड रिएक्शन की आदत हो। हो भी सकती है। क्योंकि पीक सीज़न में जहां कसोल मेन टाउन में होटल वाले 1500 रुपए से 2500 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से किराया मांग रहे हों, वहां कोई आपसे पांच सौ रुपए मांगे तो लोग हैरान तो होंगे ही। और ये तो जगह भी कसोल से ज़्यादा बढ़िया और खूबसूरत थी। बरशैणी।
"डन है।" तोमर ने उसकी तरफ पाचं सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा। तोमर शायद कुछ ज़्यादा ही एक्सायटेड हो गया था। वो भूल गया कि गेस्ट हाउस छोड़ते समय किराया चुकाने का चलन होता है।
"हिसाब तो बाद में हो जाएगा भईया।" लड़के ने तोमर से कहा। और फिर वो रूम की चाबी मेरे हाथ में देकर चला गया। जाते-जाते अपना नंबर दे गया। कह गया कि अगर कुछ खाना हो तो फोन कर दीजिएगा।
उसके जाने के बाद मैंने उस छोटे से रूम का मुआयना किया। छत व दीवारें लकड़ी की थी। सिरहाने के ठीक पीछे बड़ी-बड़ी खिड़कियां थी। और पैरों की तरफ की दीवार पर एक ऑयल पेंटिंग लगी थी जिसमें हैट पहने एक महिला की गोद में एक सफेद कबूतर बैठा हुआ था।।
उस उस तस्वीर को देखकर मेरे कानों में पिंक फ्लॉयड के उसी गीत का मुखड़ा गूंजने लगा जो पिछले दो दिनों से मैं कसोल में कई दफा सुन चुका था।
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