Vishwajeet Pradhan | Meerut का नाम Mumbai में रोशन करने वाले Actor विश्वजीत प्रधान की कहानी | Biography

फौजी वो सीरियल था जिसने भारत को शाहरुख खान दिया। लेकिन फौजी सीरियल से एक और शानदार कलाकार का डेब्यू हुआ था। उस कलाकार का नाम था विश्वजीत प्रधान। 

विश्वजीत प्रधान भले ही सिनेमाई आसमान में शाहरुख खान जैसा चमकता हुआ सितारा ना बन सके हों। लेकिन उन्होंने भी अपनी एक पहचान कायम की है। भले ही लोग विश्वजीत प्रधान के बारे में बहुत ज़्यादा जानते ना हों। मगर इनका चेहरा लोग बहुत अच्छी तरह से पहचानते हैं। 

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Biography of Bollywood Actor Vishwajeet Pradhan - Photo: Social Media

Meerut Manthan आज आपको Vishwajeet Pradhan की कहानी से रूबरू कराएगा। इस लेख में डिटेल में Vishwajeet Pradhan की कहानी हम जानेंगे। विश्वजीत प्रधान की कहानी पसंद आए तो अपने उन दोस्तों संग ये कहानी शेयर कीजिएगा जो फ़िल्मों और फ़िल्म कलाकारों की कहानियां पसंद करते हैं। 

विश्वजीत प्रधान उन दिनों इलाहबाद यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई कर रहे थे। वहां रहते हुए ये थिएटर भी करते थे। एक दिन विश्वजीत प्रधान को पता चला कि एक नया सीरियल बन रहा है जिसके ऑडिशन दिल्ली में चल रहे हैं। दोस्तों ने इन्हें ऑडिशन देने की सलाह दी तो ये दिल्ली आए और ऑडिशन देकर वापस चले गए। 

कुछ दिन बाद इन्हें फोन पर सूचना मिली की इनका सिलेक्शन उस सीरियल के लिए हो गया है। उस किरदार में इनका नाम था यासीन खान। और उस सीरियल का नाम था फौजी। वही फौजी जिसमें शाहरुख खान ने भी अभिनय किया था।  

11 सितंबर 1965 को मेरठ में विश्वजीत प्रधान का जन्म हुआ था। हालांकि इनका पुश्तैनी गांव हापुड़ ज़िले का पीरनगर सूदना है। लेकिन विश्वजीत प्रधान का जन्म और परवरिश मेरठ में हुई थी। 

आपने विश्वजीत प्रधान को कई फिल्मों में देखा होगा। अधिकतर तो ये बैड बॉय टाइप के कैरेक्टर्स में ही दिखाई देते हैं। विश्वजीत प्रधान जी को एक दफा मैंने भी देखा था मेरठ में ही। वो किस्सा आगे बताऊंगा। पहले इनकी मूल कहानी जान लेते हैं। 

विश्वजीत प्रधान ने जब 12वीं पास की तो परिवार ने इन्हें सिविल सेवा की तैयारी करने को कहा। जबकी इनके मन में सिविल सेवा की तैयारी करने को लेकर कोई उत्साह नहीं था। 

लेकिन चूंकि घर में इन्हें बहुत ज़्यादा आज़ादी नहीं मिलती थी तो आईएएस की तैयारी करने के बहाने से ये इलाहबाद चले गए। ये सोचकर कि घर से दूर रहेंगे तो कुछ आज़ादी वाली फीलिंग आएगी। इलाबाद में ही ये एक नाटक ग्रुप से जुड़े और उनके साथ मिलकर इन्होंने नुक्कड़ नाटक करने शुरू कर दिए। 

चूंकि इलाहबाद यूनिवर्सिटी में इन्होंने बीए में दाखिला लिया था। और इनका एक विषय इंग्लिश लिटरेचर भी था तो इंग्लिश लिटरेचर के इनके एक टीचर हुआ करते थे जिनका नाम था सचिन तिवारी। उन सचिन तिवारी का भी एक थिएटर ग्रुप था जिसका नाम था कैंपस थिएटर। 

विश्वजीत उनके ग्रुप से भी जुड़ गए। फिर तो थिएटर से इनका वो जुड़ाव हुआ कि ये भूल ही गए कि घर वालों ने इन्हें इलाहबाद इन्हें भेजा क्यों था। विश्वजीत फुल टाइम थिएटर एक्टर बन गए। इलाहबाद के कुछ अन्य थिएटर ग्रुप्स के साथ मिलकर भी ये नाटक खेलने लगे। 

विश्वजीत प्रधान के घरवाले इनके थिएटर व एक्टिंग करने के सख्त खिलाफ थे। इसलिए जब फौजी सीरियल के लिए विश्वजीत प्रधान दिल्ली में ऑडिशन देने आए थे तो इन्होंने अपने घरवालों को नहीं बताया था। ये चुपचाप ऑडिशन देने आए थे। हां, घरवालों से ये ज़रूर इन्होंने कहा था कि दिल्ली में इन्हें कुछ काम है। किसी एग्ज़ाम का पता करना है। 

दिल्ली में जब ये आए तो इन्होंने श्रीराम सेंटर में पहले एक नाटक देखा। यूं तो ये भी इलाहबाद में नाटक खेलते थे। लेकिन दिल्ली के लोगों को नाटक करते देखना उस वक्त इनके लिए ऐसा था जैसे किसी स्टार को एक्टिंग करते देख रहे हों। 

उसी ऑडिशन के बाद इन्हें उस जगह का पता चला जहां फौजी के लिए ऑडिशन होने थे। ऑडिशन प्लेस का पता चलने के बाद विश्वजीत भी ऑडिशन देने गए। वहां पहले से ही बहुत भीड़भाड़ थी। लेकिन किस्मत से यासीन खान के रोल के लिए इनका सिलेक्शन हो गया। 

फौजी की शूटिंग के दौरान शाहरुख खान सहित सभी कलाकारों संग विश्वजीत प्रधान की अच्छी जान-पहचान हो गई। शाहरुख के साथ उसी दौरान ही विश्वजीत प्रधान ने एक एड फिल्म में भी काम किया था जिसे फौजी के डायरेक्टर ने ही बनाया था। और उस एड फिल्म में आयशा झुल्का भी थी। वो एड फिल्म ट्रैफिक अवेयरनेस पर बनाई गई थी।

चूंकि फौजी की शूटिंग में काफी वक्त लग गया था तो इतने वक्त में विश्वजीत प्रधान ने दिल्ली के कुछ थिएटर ग्रुप जॉइन कर लिए थे। दिल्ली में इनके रहने का ठिकाना था फौजी के डायरेक्टर कर्नल राज कपूर का ऑफिस। ये और फौजी का इनका एक और सह-कलाकार रात को कर्नल राज कपूर के ऑफिस में ही सोते थे। 

फौजी की शूटिंग जब तक शुरू नहीं हुई थी तब तक इन्होंने दिल्ली के कुछ ग्रुप्स के साथ नाटक किए। उसी दौरान इन्हें उस वक्त के एक विख्यात नाटककार सफदर हाशमी संग भी काम करने का मौका मिला था। सफदर हाशमी की बाद में हत्या कर दी गई थी। जिस नाटक के बाद सफदर हाशमी की हत्या हुई थी उस नाटक में विश्वजीत प्रधान ने भी अभिनय किया था। 

सफदर हाशमी संग जब विश्वजीत प्रधान जुड़े थे उसी वक्त फौजी की शूटिंग शुरू हो गई थी। और कुछ ही दिन बाद फौजी टेलिकास्ट भी होने लगा था। फौजी में यासीन खान के रोल में विश्वजीत प्रधान के काम को भी सराहा जा रहा था। जबकी नाटकों के ज़रिए भी दिल्ली के थिएटर जगत में विश्वजीत प्रधान का नाम होने लगा था। 

लेकिन सफदर हाशमी की हत्या का इन पर बुरा असर पड़ा। सफदर हाशमी इनके दोस्त बन गए थे। उनकी हत्या से ये बहुत दुखी हुए। इन्होंने दिल्ली छोड़ने का फैसला कर लिया। फौजी की शूटिंग शुरू होने से पहले विश्वजीत प्रधान रवि बासवानी के असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर चुके थे।

विश्वजीत प्रधान के पास तेरह हज़ार रुपए थे जब इन्होंने दिल्ली से मुंबई आने का फैसला किया। मुंबई में इनकी एक कज़िन रहती थी। मुंबई में विश्वजीत का पहला ठिकाना उसी बहन का घर बना। लेकिन बहन के घर ये कुछ ही महीने रहे। उसके बाद ये एक पेइंग गेस्ट में रहने चले गए। 

विश्वजीत प्रधान का संघर्ष भी वैसा ही रहा जैसा किसी भी दूसरे कलाकार को मुंबई जाने के बाद करना पड़ता है। ये अपनी तस्वीरें लेकर डायरेक्टर-प्रोड्यूसरों के ऑफिस जाते थे। मॉडलिंग एजेंसीज़ में जाते थे। लेकिन काम नहीं मिल पाता था। कई जगह से काम मिलने की उम्मीद होती तो इनकी खुद की गलती की वजह से वो काम इनके हाथ से निकल जाता था।

दरअसल, मुंबई में अपनी कज़िन के घर से निकलने के बाद इन्होंने इतने ठिकाने बदले कि प्रोड्यूसर्स या कास्टिंग वालों को पता ही नहीं होता था कि इनका ठिकाना कौन सा है। ये जो भी नंबर किसी को देकर आएं, कुछ दिन बाद पता चले कि उस नंबर वाली जगह पर तो ये अब रहते ही नहीं हैं। 

वो लोग महीनों बाद मिलकर इनसे कहते थे कि तु्म्हें एक रोल देने के लिए फोन किया था। लेकिन तुम तो वहां अब रहते ही नहीं हो। विश्वजीत के पास ऐसी सिचुएशन में अफसोस ज़ाहिर करने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। शुरुआत में तो ये बसों के ज़रिए काम मांगने जाते थे। बाद में इन्होंने एक पुरानी मोटर साइकिल खरीद ली थी। 

विश्वजीत प्रधान के संघर्ष के दौरान का एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा कुछ यूं है कि उन दिनों फिल्मी दुनिया में आने के लिए मुंबई में संघर्ष करने वाले अधिकतर एक्टर्स सुबह के वक्त डायरेक्टर-प्रोड्यूसर्स के घर फोन करते थे। क्योंकि उस वक्त वो लोग अपने घर पर मिल जाते थे। बाद में वो शूटिंग पर चले जाते थे तो किसी से बात नहीं करते थे। 

एक दिन विश्वजीत प्रधान ने प्रकाश मेहरा के घर फोन किया। फोन उठाने वाले बंदे ने इनसे कहा कि दोपहर तक चांदीवली स्टूडियो पहुंच जाना। विश्वजीत प्रधान को लगा कि इनकी किस्मत तो खुल गई। आज तो चांदीवली स्टूडियो जाने के बाद प्रकाश मेहरा इन्हें कोई बढ़िया सा रोल दे देेंगे। 

जब विश्वजीत प्रधान चांदीवली स्टूडियो पहुंचे तो पता चला कि वहां तो अमिताभ बच्चन की जादूगर फिल्म के किसी गाने की शूटिंग चल रही है। और हज़ारों जूनियर आर्टिस्ट्स की भीड़ वहां जमा है। प्रकाश मेहरा दूर एक कुर्सी पर बैठे थे जहां पहुंचना उस वक्त मुमकिन ही नहीं था। 

विश्वजीत प्रधान ने एक असिस्टेंट को पकड़ा और उससे बताया कि आज उन्हें चांदीवली स्टूडियो आने को कहा था। उस असिस्टेंट ने पूछा कि किसने बुलाया? विश्वजीत ने जवाब दिया कि सुबह प्रकाश मेहरा के घर फोन किया था। फोन उठाने वाले ने यहीं आने को कहा था। 

फिर असिस्टेंट ने अगला सवाल विश्वजीत से किया कि तुम्हारे पास जूनियर आर्टिस्ट का कार्ड है क्या? इनके पास वो कार्ड था ही नहीं तो इन्होंने मना कर दिया। वो असिस्टेंट इनसे बोला कि फिर तुम यहां क्या करने आए हो? तुम्हें कोई पैसा नहीं मिलेगा। तुम चले जाओ यहां से।

विश्वजीत प्रधान का दिल टूट गया। एक तो ये जानकर कि उन्हें जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर चांदीवली स्टूडियो आने को कहा गया था। जबकी वो तो एक ट्रेंड आर्टिस्ट थे और फौजी जैसे सीरियल में एक बढ़िया किरदार निभा चुके थे। दूसरे, वो इतने धक्के खाकर चांदीवली स्टूडियो पहुंचे थे। लेकिन वो सारी मेहनत बेकार गई। 

विश्वजीत वहां से गए नहीं। शाम छह बजे तक वो शूटिंग देखते रहे। छह बजे के बाद वो अपने कमरे की तरफ चले। वो एक बस में सवार हो गए और ड्राइवर से जाकर बोले कि जहां खार की बस मिले आप मुझे वहां उतार देना। 

ड्राइवर ने इन्हें गौर से देखा और पूछा,"एक्टर हो?" उस बस ड्राइवर ने इतनी हिकारत भरी नज़रों से वो सवाल विश्वजीत से किया था कि ये झेंप गए। इन्होंनें जवाब में उस ड्राइवर से झूठ बोल दिया और कहा कि मैं एक्टर नहीं हूं। मैं तो डायरेक्शन में काम करता हूं। 

इनकी बात सुनकर ड्राइवर को शायद इन पर यकीन नहीं हुआ। वो बोला,"कुछ नहीं होगा। मैंने भी छह महीने तक कोशिश की थी। मेरा भी कुछ नहीं हुआ।" उस ड्राइवर की बातें सुनकर विश्वजीत प्रधान को उस दिन बड़ा डर लगा था। ये सोचने लगे कि कहीं सच में ही ऐसा ना हो जाए कि ये कभी सफलता हासिल ना कर सकें मुंबई में।

साल 1991 में आई प्रहार विश्वजीत प्रधान की पहली फिल्म थी। प्रहार इन्हें कैसे मिली इसका ज़िक्र तो फिलहाल कहीं नहीं मिला। लेकिन इतना ज़रूर एक इंटरव्यू में विश्वजीत प्रधान जी ने बताया कि नाना पाटेकर साहब ने प्रहार के लिए चुने गए चालीस लड़कों को कड़ी ट्रेनिंग दिलाई थी। 

बेलगांव के एक मिलिट्री कमांडो ट्रेनिंग स्कूल में कई दिनों तक सभी की ट्रेनिंग चली थी। और वो ट्रेनिंग एकदम कमांडो स्तर की ही थी। वो ट्रेनिंग पूरी होने के बाद प्रहार की शूटिंग शुरू हुई थी। 

प्रहार के बाद विश्वजीत प्रधान दिखे 1992 में आई यलगार में। यलगार ही इनके करियर की वो पहली फिल्म रही जिसमें लोगों ने इन्हें नोटिस किया। तब से अब तक विश्वजीत प्रधान फिल्मों में कई तरह के व छोटे-बड़े किरदार निभा चुके हैं। ढाई सौ से भी ज़्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं। कुछ टीवी शोज़ में भी ये काम कर चुके हैं। और कुछ वेब सीरीज़ में भी इन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। 

अब Vishwajeet Pradhan के परिवार के बारे में भी बात कर लेते हैं। इनके पिता प्रधान प्रीतम सिंह दो बार कॉन्ग्रेस विधायक रह चुके थे। एक दफा मवाना सीट से और एक दफा खेकड़ा सीट से इनके पिता प्रधान प्रीतम सिंह ने कॉन्ग्रेस के टिकट पर विधायकी का चुनाव जीता था। 

लेकिन विश्वजीत प्रधान जब आठ या नौ साल के रहे होंगे जब हार्ट अटैक के चलते इनके पिता की मृत्यु हो गई थी। विश्वजीत प्रधान की फैमिली के बारे में डिटेल्ड इन्फॉर्मेशन तो फिलहाल नहीं मिल सकी। लेकिन इनके एक बड़े भाई हैं जिनका नाम है डॉक्टर बिजेंद्र प्रधान। और वो मेरठ शहर के हड्डियों के नामी डॉक्टर हैं।

डॉक्टर बिजेंद्र प्रधान के क्लीनिक पर ही मैंने पहली और इकलौती दफा विश्वजीत प्रधान को देखा था। उन दिनों मैं एक पैथॉलोजी लैब में कार्यरत था। 20 साल की उम्र भी पार नहीं की थी। ये 2004 की बात है। मेरा काम होता था हॉस्पिटल्स में भर्ती मरीज़ों के ब्लड सैंपल कलैक्ट करना। 

कई दफा डॉक्टर्स भी हमें अपने क्लीनिक पर अपने किसी मरीज़ का ब्लड सैंपल लेने बुला लेते थे। उस दिन मुझे डॉक्टर विश्वजीत प्रधान के असिस्टेंट ने फोन करके आने को कहा था। 

वैसे तो मैं उस इलाके में जाना पसंद नहीं करता था, क्योंकि वहां बहुत भीड़ भाड़ होती थी। वो सोमवार का दिन था और उस दिन उस इलाके में पैंठ बाज़ार भरा करता था। पैंठ बाज़ार के चलते वहां बहुत भीड़ होती थी। इसिलिए सोमवार के दिन वहां जाना मुझे खराब लगता था। 

लेकिन नौकरी तो नौकरी ठहरी। कोई दूसरा लड़का उस दिन अवेलेबल नहीं था तो मुझे ही जाना पड़ा। मैं किलसते हुए वहां पहुंचा और मरीज़ का ब्लड सैंपल लिया। मरीज़ पैसे देकर चला गया। मैं स्टाफ के लोगों के साथ गपशप करने लगा। 

तभी मैंने देखा कि एक लंबा सा आदमी क्लीनिक में घुसा। उसके बाल भी लंबे-लंबे थे। और उसने मुंह पर रुमाल बांध रखा था। क्लीनिक में घुसते ही उस आदमी ने ना किसी की तरफ देखा और ना ही किसी से कुछ पूछा। वो तो सीधे डॉक्टर प्रधान के केबिन में घुस गया।

मुझे लगा कि कोई अहम आदमी ही होगा जो इस तरह डॉक्टर साहब के केबिन में घुस गया। वरना बिना रिसेप्शनिस्ट से पूछे तो कोई ऐसे नहीं घुस सकता था डॉक्टर प्रधान के केबिन में। मैंने असिस्टेंट से पूछा कि ये आदमी कौन था? 

उसने बताया कि ये डॉक्टर साहब के भाई हैं जो फिल्मों में काम करते हैं। "फिल्मों में काम करते हैं" ये सुनकर ही मेरा एक्सायटमेंट लेवल कई गुना बढ़ गया। मैंने पूछा कौन सी फिल्म में काम किया है इन्होंने? क्या नाम है इनका? 

उसने बताया कि ये तो कई फिल्मों में काम कर चुके हैं। इनका नाम विश्वजीत प्रधान है। उस वक्त तक मुझे वाकई में नहीं पता था कि कोई विश्वजीत प्रधान नाम का एक्टर है फिल्म इंडस्ट्री में जो मेरठ का ही है। 

असिस्टेंट ने ही मुझे बताया था कि अभी कुछ दिन पहले बॉबी देओल की बर्दाश्त फिल्म आई है ये उसमें भी हैं। ये सुनकर तो मेरे पेट में खलबली मच गई। बर्दाश्त फिल्म देखने के लिए मैं मचलने लगा। लेकिन दिक्कत ये थी कि बर्दाश्त लगकर उतर भी चुकी थी। यानि अब तो सीडी पर ही देखी जा सकती थी। 

किस्मत से मैं एक सस्ता और चालू किस्म का सीडी प्लेयर खरीद चुका था। मैंने एक सीडी खरीदी बर्दाश्त फिल्म की और फिल्म देखी। फिल्म अच्छी लगी थी। विश्वजीत प्रधान को भी देखा और पहचान लिया। याद आया, अरे ये तो हर फिल्म में गुंडे का ही रोल निभाता है। 

इस तरह मुझे पता चला कि हमारे मेरठ शहर के हैं एक्टर विश्वजीत प्रधान। विश्वजीत प्रधान जी की पत्नी सोनालिका प्रधान भी मेरठ की ही हैं। और सोनालिका प्रधाना एक फैशन डिज़ाइनर हैं। फिल्म इंडस्ट्री में सोनालिका प्रधान जी की भी अच्छी जान-पहचान है। इन दोनों के दो बच्चे, बेटी ध्रुविका प्रधान व बेटा ओजस्वी प्रधान हैं।

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