Jeevankala | पुराने दौर की शानदार अदाकारा व नृत्यांगना जिसे Bollywood अब भुला चुका है | Biography

आज कहानी कही जाएगी गुज़रे ज़माने की मशहूर नृत्यांगना-अदाकारा जीवनकला की। जीवनकला, जिन्हें आज फिल्म इंडस्ट्री और अधिकतर फिल्मों के शौकीन भुला चुके हैं। जबकी एक वक्त था जब अपने डांस के लिए जीवनकला चर्चाओं में रहती थी। 

नृत्य और अभिनय इन्हें विरासत में मिले थे। इनके पिता का नाम था दत्तू उर्फ दत्तात्रेय काम्बले। और माता का नाम था गंगूबाई। वो दोनों ही साइलेंट फिल्मों के दौर के कलाकार थे। पिता दत्तात्रेय काम्बले पूना के रहने वाले थे। और मां गंगूबाई कोल्हापुर की निवासी थी। दोनों ही पूना में मौजूद युनाइटेड पिक्चर्स सिंडिकेट में नौकरी करते थे। 

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Biography of Veteran Actress & Dancer Jeevankala - Photo: Social Media

जीवनकला के माता-पिता ने अपने समय की कई हिट साइलेंट फिल्मों में काम किया था। फिर जब टॉकी फिल्में बनने लगी तो दोनों मराठी सिनेमा के नामी चेहरे बन गए। 29 जून 1944 को गंगूबाई ने जीवनकला को जन्म दिया था। 

उस वक्त ये लोग पूना के दिवाकरवाड़ा की एक बिल्डिंग में रहा करते थे। उस समय मंगेशकर परिवार भी उसी बिल्डिंग में रहता था। और जीवनकला जी के माता-पिता के मंगेशकर परिवार संग बड़े अच्छे ताल्लुकात थे। एक इंटरवव्यू में जीवनकला जी ने बताया था कि महान गायिका लता मंगेशकर उनकी मां गंगूबाई को मौसी कहती थी। 

जिस वक्त जीवनकला जी का जन्म हुआ था उस वक्त लता जी की उम्र लगभग 14 साल थी। जीवनकला जी को ये नाम लता जी ने ही दिया था। लता जी ने तब गंगूबाई से कहा था कि मौसी, ये आपके जीवन की कला है। इसलिए इसका नाम है जीवनकला। 

जीवनकला अपने माता पिता की इकलौती संतान थी। छठी क्लास तक इनकी पढ़ाई पेशवाओं के स्कूल हुज़ूरबाग से हुई थी। जबकी छह साल की छोटी सी उम्र से ही जीवनकला जी ने बालासाहब गोखले गुरूजी से कत्थक की ट्रेनिंग लेना स्टार्ट कर दिया था। 

जीवनकला कहती हैं,"हम लोग दिवाकरवाड़ा के लक्ष्मी रोड पर रहते थे। कत्थक की मेरी ट्रेनिंग घर पर ही होती थी। जब मैं कत्थक का अभ्यास करती थी तो घुंघरुओं की आवाज़ सड़क से गुज़रते लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती थी।"

"उसी आवाज़ को सुनकर एक दिन मराठी फिल्मों के उस वक्त के नामी डायरेक्टर-प्रोड्यूसर दत्ता धर्माधिकारी हमारे घर आए। उन्होंने मुझे अपनी फिल्म 'अखेर जम्ले' में बाल कलाकार की हैसियत से लेने की बात कही। मेरे माता-पिता ने बिना देर किए हामी भर दी। और इस तरह छह साल की उम्र में मैंने पहली दफा किसी फिल्म में ना सिर्फ अभिनय किया, बल्कि नृत्य भी किया। मैं हीरो की छोटी बहन उस फिल्म में बनी थी।"

बतौर बाल कलाकार जीवनकला की दूसरी थी 'तीन मुल:' और इस फिल्म में ये एक्ट्रेस रंजना की बेटी के रोल में थी। इनके माता-पिता ने इनके नाम से एक आर्ट ग्रुप भी बना रखा था जिसका नाम था जीवनकला एंड डांसिंग पार्टी। अपने ग्रुप के साथ बचपन से ही पूना में होने वाले विभिन्न गणपति कार्यक्रमों में भी ये डांस किया करती थी। 

जीवनकला बताती हैं कि जब लता मंगेशकर फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर हो गई और फिल्मी गीत गाने में व्यस्त हो गई तो मंगेशकर परिवार पूना से बॉम्बे शिफ्ट हो गया। मंगेशकर परिवार की खुद की एक आर्केस्ट्रा पार्टी थी। अपनी आर्केस्ट्रा पार्टी में सभी मंगेशकर भाई-बहन गाना गाते थे। 

उस समय लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भी कम उम्र के थे और इनकी आर्केस्ट्रा पार्टी में वाद्य बजाते थे। महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों में उस आर्केस्ट्रा पार्टी के शोज़ हुआ करते थे। जीवनकला भी उस समय इनकी आर्केस्ट्रा पार्टी का हिस्सा हुआ करती थी। और डांस करती थी। तब इन्हें अक्सर पूना से बॉम्बे आने का मौका मिलता रहता था।

करीब पांच सालों तक जीवन कला ने गोखले गुरूजी से कत्थक सीखा। अपने वक्त की नामी एक्ट्रेस रही जयश्री गडकर इन्हीं गोखले गुरूजी की शिष्या थी। आखिरकार साल 1956 में जीवनकला जी के माता-पिता भी इन्हें लेकर बॉम्बे आ गए। 
 
दादर के कोहिनूर सिनेमा के सामने मौजूद मुकुंद मेंशन बिल्डिंग इनका ठिकाना बना। यहां आकर जीवनकला जी को राममोहन नाइट स्कलू में सातवीं कक्षा में दाखिला दिला दिया गया। साल 1960 में यहां से उन्होंने 11वीं पास की थी। 

1959 की सुपरहिट फिल्म 'गूंज उठी शहनाई' से जीवन कला की हिंदी फिल्मों में शुरुआत हुई थी। एक दिन अपनी मां के साथ जीवन कला नामी डायरेक्टर-प्रोड्यूसर विजय भट्ट से मिलने अंधेरी स्थित 'प्रकाश स्टूडियो' गई। 

'गूंज उठी शहनाई' के लिए उन दिनों विजयट भट्ट एक सोलो डांसर की तलाश कर रहे थे। संगीतकार वसंत देसाई और डांस गुरू प्रेम धवन की मौजूदगी में जीवनकला जी का टेस्ट लिया गया। 

इन दोनों को जीवनकला का डांस पसंद आया। दोनों ने विजय भट्ट से इनकी सिफारिश की। और इस तरह 'गूंज उठी शहनाई' फिल्म के गीत 'अंखियां भूल गई हैं सोना। दिल पे हुआ है जादू टोना' पर जीवनकला जी को डांस करने का चांस मिला।

इसी साल यानि 1959 में के.अमरनाथ प्रोडक्शन्स की फिल्म 'कल हमारा है' में जीवनकला ने एक सोलो व एक ड्यूट गाने पर डांस किया। सोलो गीत के बोल थे 'ऐसे ना देखो रसिया जिया जाए।' व ड्यूट गीत के बोल थे 'जाओ रसिया हटो जाओ रसिया।' 

ये गीत चित्रगुप्त ने कंपोज़ किया था। और इसे गाया था लता मंगेशकर व उनकी छोटी बहन उषा मंगेशकर ने। जबकी इस गीत में जीवनकला की सह नर्तकी थी एक्ट्रेस शीला कश्मीरी। आज के दौर के नामी प्रोड्यूसर फिरोज़ नाडियाडवाला इन्हीं शीला कश्मीरी उर्फ मुनीरा नाडियाडवाला के पुत्र हैं।

जीवनकला ने कुछ तमिल फिल्मों मं भी नृत्य किया था। साल 1962 में आई 'कोंजुम सलंगई पहली तमिल फिल्म थी जिसमें इन्होंने नृत्य किया था। एक दिन एक अखबार में जीवनकला ने एक विज्ञापन देखा जिसमें लिखा था कि तमिल फिल्म के लिए एक क्लासिकल डांसर की ज़रूरत है। अपनी मां को साथ लेकर जीवनकला दिए गए पते पर पहुंच गई। वो पता था दादर का रूपतारा स्टूडियो। एक छोटे से टेस्ट के बाद जीवनकला को फौरन साइन कर लिया गया। तब उनकी उम्र 18 साल हो चुकी थी। 

साल 1961 में आई फिल्म 'किस्मत पलट के देख' में पहली दफा जीवनकला को अभिनय करने का मौका मिला। फिल्म के हीरो-हीरोइन थे अनूप कुमार और प्रीतिबाला। जीवनकला सहनायिका थी। जबकी इसी साल 'ज़िंदगी और ख़्वाब' में कॉमेडियन आग़ा संग कॉमेडी की थी। 

1964 में आई 'चार दरवेश' में जीवनकला ने एक अहम किरदार निभाया था। 1965 की 'हिमालय की गोद में' फिल्म में ये माला सिन्हा की सहेली बनी थी। जबकी 1968 की सरस्वतीचंद्र में इन्होंने खलनायिका का किरदार निभाया था। एक्टिंग के साथ-साथ उस दौर की कई ए-ग्रेड फिल्मों व स्टंट फिल्मों में इन्होंने डांस भी किया था। 

साल 1965 में जीवनकला की मां की मृत्यु हो गई थी। उस वक्त इनकी उम्र 21 साल थी। अभिनेत्री सुलोचना लाटकर जी संग जीवनकला के माता-पिता के बहुत अच्छे रिश्ते थे। इनके पिता सुलोचना जी को दीदी कहते थे। 

पत्नी की मृत्यु के बाद इनके पिता ने एक दिन सुलोचना जी से कहा,"मेरी एक ही लड़की है। जाने मेरे बाद इसका क्या होगा। दीदी, आप इसकी शादी करा दो।" सुलोचना जी ने जीवनकला के जीवनसाथी के तौर पर मराठी फिल्मों के स्क्रीनप्ले व डायलॉग राइटर राम केलकर का नाम सुझाया। 

सुलोचना जी राम केलकर को अपना बेटा मानती थी। रिश्ते की बात शुरू हुई और आखिरकार 1969 में दोनों की शादी हो गई। चूंकि राम केलकर चाहते थे कि उनकी पत्नी उनका घर संभाले तो पति की इच्छा पूरी करते हुए जीवनकला ने फिल्मों को अलविदा कह दिया। सरस्वतीचंद्र उनकी आखिरी फिल्म साबित हुई। 

जीवनकला से शादी करना राम केलकर के लिए बहुत शुभ साबित हुआ। उन्हें हिंदी फिल्मों में भी पटकथा लेखक के तौर पर ब्रेक मिला। साल 1972 में आई बेईमान का पटकथा लेखन राम केलकर ने किया था। सोहनलाल कंवर की ये फिल्म सुपरहिट रही थी। इसके बाद तो राम केलकर को एक के बाद एक, कई हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखन का काम मिला। 

पिया का घर, आप की कसम, सन्यासी, कालीचरण, विश्वनाथ, आशा, हीरो, आग ही आग, रामलखन, खलनायक और श्याम-घनश्याम नामक फिल्मों की पटकथा राम केलकर ने ही लिखी थी। डायरेक्टर सुभाष घई और सोहनलाल कंवर के पसंदीदा लेखक थे राम केलकर। साल 2002 में 73 साल की उम्र में राम केलकर का निधन हो गया था।

जीवनकला के तीन बच्चे हैं। दो बेटे योगेश व हेमंत, और एक बेटी मनीषा। बच्चों के साथ अब मुंबई के वर्ली की एनी बेसेंट रोड पर जीवनकला रहती हैं। उनके बेटे हेमंत एडिटर, राइटर और डायरेक्टर हैं। वो सुभाष घई के असिस्टेंट रह चुके हैं। 

2008 में आई भोला शंकर नाम की मराठी फिल्म हेमंत केलकर ने ही बनाई थी। जीवनकला की बेटी मनीषा केलकर अभिनेत्री हैं और लाटरी, बन्दूक व झोल सहित कई हिंदी व मराठी फिल्मों में काम कर चुकी हैं। 

शादी के बाद जीवनकला ने भले ही फिल्मों से खुद को दूर कर लिया हो। लेकिन नृत्य से वो कभी भी खुद को दूर ना कर सकी। उन्होंने अपनी एक डांस एकेडेमी शुरू की थी जो एक वक्त पर काफी अच्छी चली थी। मेरठ मंथन ईश्वर से प्रार्थना करता है कि जीवनकला जी सदा स्वस्थ रहें। जीवनकला जी को जन्मनदिन की अनेकों-अनेक शुभकामनाएं। 

नोट- जीवनकला के बारे में ये सभी जानकारियां हमने ब्लॉग 'बीते हुए दिन' के एक आर्टिकल से ली हैं। ये ब्लॉग फिल्म हिस्टोरियन श्री शिशिर कृष्ण शर्मा चलाते हैं। इनका अपना एक यूट्यूब चैनल भी है इसी नाम से। आपको इनका ब्लॉग व यूट्यूब चैनल देखने चाहिए।

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