Banwari Lal Jhol | बॉलीवुड फिल्मों का वो छोटा कलाकार जिसे हम पहचानते तो हैं, मगर जानते नहीं | पढ़िए इनकी कहानी | Biography

शुरुआत में जब ये साहब अपना नाम फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों को बताते थे तो वो लोग बहुत हैरान होते थे। कुछ तो हंसने लगते थे। और कुछ इनसे कहते थे कि कहीं तुम कोई झोल-झाल तो नहीं करते हो? 

इन्हें उस वक्त झोल-झाल का मतलब पता था नहीं। तो नर्वसनैस में ये भी हां कह देते थे। इन्हें तो कुछ दिनों के बाद पता चला था कि झोल-झाल का मतलब गड़बड़-घोटाला होता है। 

तो लोग इनसे पूछते क्यों थे कि कहीं तुम कोई झोल-झाल तो नहीं करते? इसका जवाब है "इनके नाम की वजह से।" जी हां, इनका नाम ही अजब है एकदम। इनका नाम है बनवारी लाल झोल। यानि झोल शब्द इनके नाम के साथ जुड़ा है। ये हिमाचली ब्राह्मण हैं। 

झोल उपनाम इनके पुरखों के ज़माने से इस्तेमाल होता आ रहा है। इसिलिए इनका नाम भी बनवारी लाल झोल है। वैसे ये भी जान लीजिए कि बनवारी जी दिल्ली में पले-बढ़े हैं। दिल्ली के सदर बाज़ार में इनके पिता की एक धूप व अगरबत्ती की दुकान थी, जिसका नाम था नारायण धूप। 

Biography of Actor Banwari Lal Jhol - Photo: Social Media

बनवारी लाल झोल का जन्म 2 अक्टूबर को हुआ था। इनके जन्म के साल का पता नहीं चल सका हमें। एक्टिंग का शौक इन्हें बचपन से ही था। इसलिए ये पढ़ाई-लिखाई में कम और नाटकबाज़ी में ज़्यादा ध्यान लगाते थे। 

वैसे जब इन्होंने एक कंपनी में नौकरी शुरू की थी तो उसमें अपना नाम ये बनवारी लाल शर्मा लिखते थे। मगर जब इन्होंने तय किया कि फ़िल्मों में नाम कमाना है, तो साथ ही ये भी तय किया कि अपना नाम बनवारी लाल झोल ही रखना है। क्योंकि ये ऐसा नाम है कि एक बार जो सुनले वो इसे भूल नहीं पाता है जल्दी से।

बनवारी लाल झोल ने दिल्ली में खूब थिएटर किया। माइम आर्ट के ये बहुत दिग्गज कलाकार हैं। और माइम आर्ट के चलते इन्हें कई वर्ल्ड टूर करने के चांस भी मिल चुके हैं। जब दिल्ली में इनका बहुत नाम हो गया। 

और दिल्ली में इन्होंने दूरदर्शन के लिए भी काफ़ी काम किया, तो इन्होंने सोचा कि बॉम्बे चलकर फ़िल्मों में नाम कमाया जाए। इन्हें लगता था कि जैसे दिल्ली में बहुत आसानी से सफ़लता मिल गई, ऐसे ही बॉम्बे में भी मिल जाएगी। 

मगर दो सालों तक ये भटकते रहे। इन्हें कोई काम बॉम्बे में नहीं मिला। इनका सारा आत्मविश्वास धरा का धरा रह गया। ये हार मानने ही वाले थे कि तभी इन्हें एक पंजाबी शो में काम मिल गया। और किस्मत से रोल भी बहुत अच्छा मिला। 

वो शो राजा बुंदेला ने डायरेक्ट किया था। वो शो ज़ी पंजाबी चैनल पर प्रसारित हुआ था। बनवारी लाल झोल बताते हैं कि जब राजा बुंदेला ने इन्हें वो रोल दिया तो उनका अंदाज़ ऐसा था जैस वो इन पर कोई बहुत बड़ा अहसान कर रहे हों।

मगर जब राजा बुंदेला ने इनकी अभिनय प्रतिभा को करीब से देखा तो उनका अंदाज़ व रवैया इनके प्रति एकदम से बदल गया। फिर तो राजा बुंदेला जब भी इनसे मिलते, बहुत आदर से मिलते थे। 

और राजा बुंदेला ने इन्हें अपना एक और सीरियल भी ऑफ़र किया। यानि राजा बुंदेला इनकी प्रतिभा के बहुत कायल हो गए थे। राजा बुंदेला जी के उस शो के बाद बनवारी लाल झोल जी ने और भी कुछ टीवी शोज़ किए।

फ़िल्मों की बात करें तो इनकी पहली फ़िल्म थी बाज़ीगर। और आपको बता दूं कि राजा बुंदेला के साथ काम करने से बहुत पहले बाज़ीगर इन्होंने की थी। उस वक्त ये फ़िल्मों को लेकर इतने सीरियस भी नहीं होते थे। दूरदर्शन पर नाटक करके व स्ट्रीट माइम प्लेज़ करके ही ये संतुष्ट रहते थे। तो हुआ कुछ यूं कि एक दिन ये अपने घर आए तो इनकी पत्नी ने इन्हें बताया कि कोई फ़िल्म वाला था। उसने फोन किया था। वो आपसे मिलने को कह रहा था। 

बनवारी जी ने पत्नी की बात को गंभीरता से नहीं लिया। और ये खाना-पीना करके सो गए। और अगले दिन सुबह फिर से काम पर निकल गए। उस दिन भी जब ये शाम को वापस लौटे तो इनकी पत्नी ने इन्हें बताया कि आज फिर से उस फ़िल्म वाले का फोन आया है। 

इस बार बनवारी जी ने इस बात को गंभीरता से लिया। इन्होंने फोन करने वाले के नंबर पर फोन किया। उसने इनसे कहा कि आप सुबह कुतुब होटल आ जाइएगा। सुबह निकलने से पहले इन्होंने एक बार फिर से उस नंबर पर फोन किया। तो उन्होंने बताया कि आप सीधे भार्गव फ़ार्म हाउस आ जाइए।

उस ज़मान में इनके पास बजाज चेतक स्कूटर हुआ करता था। अपने स्कूटर से ये भार्गव फार्म हाउस पहुंचे। जब ये वहां पहुंचे तो फोन करने वाला शख्स उसने मिला। वो बाज़ीगर फ़िल्म का दिल्ली का प्रोडक्शन संभाल रहा था। उसने बनवारी लाल झोल साहब को मुंबई की टीम से मिलाया। 

उस वक्त तक भी बनवारी लाल झोल को यही लग रहा था कि कोई छोटी-मोटी फ़िल्म होगी। मगर जैसे ही ये अंदर गए तो इनकी आंखें खुली रह गई। अंदर बड़ा सा सेट लगा था। बड़ी-बड़ी लाइट्स व रिफ़्लेक्टर्स खड़े थे। उसी वक्त इन्होंने शाहरुख खान को भी वहां देखा। उस वक्त इन्हें अहसास हुआ कि ये तो कोई बड़ी फ़िल्म है।

प्रोडक्शन वालों ने बनवारी जी को अब्बास-मस्तान से मिलाया। अब्बास-मस्तान इनसे अच्छे से मिले। और फिर प्रोडक्शन वाले शख्स ने(जो इन्हें दो दिन से फ़ोन कर रहा था।) इनसे कहा कि ठीक है, आप घर चले जाइए। अगर आपका सिलेक्शन होगा तो आपको बुला लिया जाएगा। 

बनवारी लाल जी कहते हैं कि उस दिन वो गए तो बहुत अकड़ में थे वहां। मगर जब घर वापस लौटे तो रास्ते भर भगवान से प्रार्थना करते हुए आए कि इन्हें बाज़ीगर फ़िल्म में चुन लिया जाए। 

घर पहुंचकर इन्होंने भगवान शिव के सामने हाथ जोड़े और मन ही मन कहा कि हे भगवान, मैं तो कोई मामूली फ़िल्म समझ रहा था। ये तो कोई बहुत बड़ी फ़िल्म है। मुझे इसमें काम दिला दीजिए। 

फिर पूरी रात ये उसी बारे में सोचते रहे। आखिरकार जब सुबह हुई तो इनके घर फिर से उस प्रोडक्शन वाले का फोन आया। और उसने इन्हें आने को कहा। ये बहुत खुश हुए। और खुशी-खुशी भार्गव फ़ार्म हाउस पहुंचे।

वहां पहुंचकर इन्होंने देखा कि पूरी टीम तैयार है। और जॉनी लीवर भी वहां मौजूद हैं। बनवारी लाल जी को याद आया कि साल 1990 में इन्होंने जॉनी लीवर के साथ हरियाणा के हिसार में एक शो किया था। 

और जॉनी लीवर इनकी परफॉर्मेंस से तब बहुत प्रभावित भी हुए थे। तो उस दिन भार्गव फ़ार्म हाउस में जॉनी लीवर को देखकर ये मन ही मन सोचने लगे कि काश जॉनी जी भी इन्हें पहचान लें। 

बनवारी लाल झोल चुपचाप एक कोने में खड़े थे। तभी जॉनी लीवर की नज़र इन पर पड़ी। जॉ़नी जी ने इन्हें पहचान लिया। और जॉनी लीवर इनके पास आकर बोले कि तुम तो वही हो ना जो हिसार वाले शो में भी थे। बनवारी जी जब मुस्कुराए तो जॉनी लीवर भी बहुत खुश हुए। फिर इनका हाथ पकड़कर जॉनी लीवर इन्हें अपने साथ एक टेबल की तरफ़ ले गए। 

चूंकि उस वक्त लंच चल रहा था, तो जॉनी लीवर ने एक प्लेट इन्हें दी। और उस दिन जॉनी लीवर ने इनके साथ लंच किया। लंच के बाद जॉनी लीवर ने ही इन्हें फिर से अब्बास-मस्तान से मिलाया। अन्नु मलिक से मिलाया। और बाज़ीगर के प्रोड्यूसर रतन जैन से भी मिलाया। और इन सबसे जॉनी लीवर ने बनवारी लाल झोल के बारे में यही कहा कि ये दिल्ली के बहुत अच्छे आर्टिस्ट हैं। 

फिर आया शूट का वक्त। बाज़ीगर फ़िल्म का वो सीन याद कीजिए जिसमें काजोल के पास एक सुनार आता है और कहता है कि आपकी बहन ने एक मगंलसूत्र बनवाया था। और बिल के कुछ पैसे बकाया हैं। सुनार के रोल में वो बनवारी लाल झोल साहब ही थे। उस सीन के बारे में बनवारी जी ने बताया था कि बाज़ीगर के राइटर ने पहले उन्हें सिर्फ़ एक लाइन लिखकर दी थी। 

मगर अब्बास-मस्तान ने राइटर को हड़काकर कहा कि एक पूरा सीन बनाकर दो। ये क्या एक लाइन लिखकर दे रहे हो? तब इनके लिए वो पूरा सीन लिखा गया, जिसमें शुरुआत में इनसे जॉनी लीवर टकराते हैं। जॉनी लीवर के साथ कुछ कॉमेडी होती है। और तब ये काजोल से टकराते हैं। फिर वहीं से बाज़ीगर की कहानी आगे बढ़ती है।

बाज़ीगर जब रिलीज़ हुई थी उस वक्त बनवारी लाल झोल नॉर्वे में थे। ये वहां माइम शोज़ करने गए थे। बाज़ीगर बड़ी हिट साबित हुई थी। मगर बनवारी लाल झोल जी ने तब भी फ़िल्मों को गंभीरता से नहीं लिया था। ये दूरदर्शन शोज़, थिएटर, नुक्कड़ नाटक व माइम शोज़ ही करते रहे। क्योंकि उनसे भी इनका बढ़िया जीवन चल रहा था। 

मगर सन 2000 के आखिर में इनका वो काम लगभग खत्म हो गया। जिसके बाद आखिरकार सन 2001 में बनवारी लाल झोल मुंबई आए। और मुंबई में इन्हें वो संघर्ष करना पड़ा जिसका ज़िक्र आपने इस लेख की शुरुआत में पढ़ा है। हालांकि बाद में इन्हें भी काम मिलने लगा। 

बनवारी जी ने कई फ़िल्मों व टीवी शोज़ में काम किया है। ये आज भी माइम शोज़ करते हैं। वॉइस एक्टर के तौर पर भी काम करते हैं। अब तक बनवारी जी 35-40 फ़िल्मों में काम कर चुके हैं। और सौ के करीब टीवी सीरियल्स में इन्होंने काम किया है। 

एक और जो बहुत रोचक बात इनके करयिर से जुड़ी है वो ये कि इन्होंने लाफ़्टर चैलेंज के पहले सीज़न में भी हिस्सा लिया था। हालांकि ये तीसरे सीज़न में ही बाहर हो गए थे। 

आखिरी में मुझे एक दृश्य और याद आ गया। परेश रावल वाली ओह माय गॉड फ़िल्म में बनवारी लाल झोल ही उस राजस्थानी लाला के रोल में दिखे थे जिसे परेश रावल जी एक साधारण सी कृष्ण मूर्ति को प्राचीन मूर्ति बताकर बहुत महंगे दामों में बेच देते हैं।            

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